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Monday, 12 October 2015

बैंकिंग और काला धन

                                         दिल्ली अशोक विहार स्थित बैंक ऑफ़ बड़ौदा की एक शाखा में हुए कारनामे के बाद काले धन को पिछले आम चुनाव के समय ही बड़ा मुद्दा बनाने वाली भाजपा के सामने आज विश्वसनीयता का बड़ा संकट उत्पन्न हो चुका है क्योंकि इस मामले में जिस तरह से लगभग एक वर्ष तक बैंकिंग और देश के आवश्यक वित्तीय नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया जाता रहा पर किसी की भी नज़र नहीं पड़ी पर जब बैंक के आंतरिक लेखा परीक्षण में इस शाखा से विदेशों में भेजे जाने वाले पैसे की मात्रा में अप्रत्याशित वृद्धि देखने को मिली तो बैंक प्रबंधन ने इसकी जानकारी सरकार को अगस्त महीने में दी. वैसे तो इस तरह के घोटाले कर देना अपने आप में बहुत आसान नहीं है पर जिस तरह से बैंकिंग नियमों का उल्लंघन किया जाता रहा और फर्ज़ी कम्पनियों के माध्यम से लगभग छह हज़ार करोड़ रूपये विदेश भेज दिए गए उसके बाद भी सरकार ने सीबीआई जांच के लिए दो माह का समय ले लिया जिससे सम्बंधित लोगों को अपने बचाव के लिए रास्ते खोजने का अवसर भी मिल गया होगा. घोटाले के सामने आने के बाद भी जिस तरह से सरकार और बैंक ने दो महीने तक किसी भी तरह की प्राथमिकी दर्ज़ नहीं करवाई उससे उसकी मंशा पर संदेह होने ही लगता है.
                    निश्चित तौर पर काले धन पर जनता से बड़े बड़े वायदे करने वाले पीएम मोदी और उनकी सरकार के लिए बिहार चुनावों के समय इस बात का खुलासा होना एक बड़ी चुनौती के रूप में भी सामने आया है क्योंकि इससे विरोधी दलों को उन पर खुला हमला करने की छूट मिल जाएगी और जो बात शान से विदेशों तक में पीएम ठोंक कर कहा करते थे कि बोलो इतने समय में कोई घोटाला हुआ कि नहीं शायद अब वे उस ऊंचे स्वर में बोलने का अधिकार भी खोते हुए नज़र आने वाले हैं. यहाँ पर सवाल केवल राजनीति का ही नहीं है पर जब इस तरह के मामलों पर विपक्ष में रहते हुए भाजपा सरकार पर हावी रहा करती थी तो अब उसके लिए इस मुद्दे से भाग पाना आसान नहीं होने वाला है तथा चुनावी बहसों में भी अब टीवी पर भाजपा के प्रवक्ताओं को इस मुद्दे पर सफाई देने में कठिनाई ही होने वाली है. तकनीकी तौर पर इसमें क्या किया जा सकता था इस बारे में अभी कांग्रेस की तरफ से कपिल सिब्बल और पी चिदंबरम के बयान आने के बाद ही यह स्पष्ट हो पायेगा कि सरकार के लिए यह मुद्दा कितना परेशान करने वाला साबित हो सकता है क्योंकि मोदी सरकार की नाक के नीचे इस तरह का घोटाला हो और विपक्ष चुनावी माहौल में उसे बख्श दे ऐसा भी नहीं हो सकता है.
               चुनावी राजनीति से इतर सरकार और वित्त मंत्रालय को यह सोचने का समय भी अब आ गया है कि आखिर इतने कड़े नियमों के बाद भी कोई समूह इस तरह से दिल्ली जैसी जगह से एक वर्ष तक लगातार बैंकिंग नियमों की अनदेखी करते हुए लगभग छह हज़ार करोड़ रुपयों को किस तरह से विदेश भेजने में सफल हो सकता है ? इस प्रक्रिया के बीच में संभावित कमियों पर विचार करने के साथ ही इन्हें रोकने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब तक सरकार की तरफ से बैंकिंग उर वित्तीय संस्थाओं के अधिकारीयों के साथ ही प्रवर्तन निदेशालय की टीम संयुक्त रूप से इस सब पर नज़र रखने की स्थिति में नहीं आती है तब तक स्थितियों को पूरी तरह से सुरक्षित नहीं किया जा सकता है. यह सही है कि संप्रग सरकार ने वित्तीय लेन देन में कई तरह के सुधार किये थे जिनके चलते आज किसी के लिए भी विदेशों में धन भेजना उतना आसान नहीं रह गया है जितना कभी हुआ करता था पर अभी भी यह तंत्र पूरी तरह से सही है यह कह पाना किसी के बस की बात नहीं है इसलिए इन कमियों को पकड़ने के लिए देश के तंत्र को और भी मज़बूत किये जाने की आवश्यकता भी है जिसे सरकार का वित्त मंत्रालय ही कर सकता है.
              यह तो सरकार और वित्त मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाले बैंक की स्थिति है साथ ही निजी क्षेत्र के बैंक किस तरह से ग्राहकों को बैंकिंग से अतिरिक्त अन्य सुविधाएँ दिलवाने के नाम पर नियमों की अनदेखी करने में लगे हुए हैं क्या यह सरकार की नज़रों में अभी तक नहीं आ पाया है ? निजी क्षेत्र के बैंक कुछ इस तरह से भी खाते खोलने में लगे हुए हैं जिनमें वे ग्राहकों को कुछ ऐसी सुविधाएँ भी दे दिया करते हैं जिनसे रिज़र्व बैंक के दिशा निर्देशों का खुले आम उल्लंघन होता है फिर भी सरकार उस तरफ से आँखें मूंदे ही रहती है. क्या सरकार को अपने बैंकों के अतिरिक्त इन निजी क्षेत्र के बैंकों के काम काज पर भी कड़ी निगरानी नहीं रखनी चाहिए जिससे इनके द्वारा किये जाने वाले घोटाले सामने आ सकें ? आमतौर पर सरकारें केवल तभी आगे बढ़ती हैं जब उनके लिए आगे बढ़ना एक मजबूरी हो जाता है और वे इस तरह से किसी भी बैंक आदि के काम काज की समीक्षा करना ही नहीं चाहती हैं जिससे बैंकिंग सेक्टर के सुधारों को गंभीर झटका भी लगता है. सरकारी बैंक नियमों की दुहाई देते हुए जो काम करने से मना कर देते हैं निजी क्षेत्र के बैंक उसी काम को आसानी से कर देते हैं जिससे सरकारी बैंकों के बड़े कारोबारियों के माध्यम से मिलने वाले धन का प्रवाह भी निजी क्षेत्र के बैंकों की तरफ हो जाता है.
                कर सुधारों एक साथ ही अब समय बैंकिंग क्षेत्र में सुधारों की तरफ बढ़ने का आ चुका है और सरकार को अब इस बारे में सोचना ही होगा क्योंकि किसी भी परिस्थिति में सरकार के पास जो कानून होता है वह उसके माध्यम से ही काम कर पाती है पर जब तक जागरूकता और कर्तव्यनिष्ठा के साथ काम करने वाले लोगों का समावेश इस क्षेत्र में भी नहीं होगा तब तक परिस्थितियां इसी तरह से सामने आती रहेंगीं. केंद्र और राज्यों को इस मामले में मिलकर संयुक्त प्रयास करने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक कर चोरी को रोकने और काले धन पर कठोर नीति का अनुपालन नहीं किया जाता है तब तक सरकार के लिए कुछ भी कर पाना संभव नहीं होने वाला है. बैंक ऑफ़ बड़ौदा के इस घोटाले ने पीएम मोदी की बेदाग सरकार पर भ्रष्टाचार के वे दाग तो लगा ही दिए हैं जिनसे वे अभी तक हुंकार करते हुए बचने की उद्घोषणा किया करते थे चुनाव के समय अब सरकार अपना किस तरह से बचाव करती है यह तो समय आने पर ही पता चल पायेगा.    
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