मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 9 October 2015

शीर्ष स्तर पर आंकड़ों का खेल

                                                              केंद्र सरकार द्वारा एलपीजी में डीबीटी लागू किये जाने के बाद से ही जिस तरह से खुद पीएम मोदी ने इस बात को कहा कि इस योजना से सरकार ने १२,७०० करोड़ रुपयों की बचत कर ली है तो उसके इस बयान पर भी सवालिया निशान लग गए हैं. इस दिशा में काम करने वाली इंटरनेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ सस्टेनेबल एनर्जी की तरफ से इन आंकड़ों को यथार्थ से परे बताते हुए पूरे आंकड़ों को ही गलत बता दिया है तो इस स्थिति में यह सवाल भी सामने आता है कि पीएम को इस तरह के आंकड़ें आखिर सरकार के कौन सूत्र दे रहे हैं और यदि इनको किसी विश्वस्त सरकारी सूत्रों से नहीं पाया जा रहा है तो खुद पीएम सी तरह के बयान देने में क्यों लगे हुए हैं ? आज मोदी किसी प्रान्त के नेता नहीं बल्कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मुखिया के तौर पर दुनिया में जाने जाते हैं पर उनके वक्तव्यों में जिस तरह का तकनीकी पैनापन होना चाहिए कई बार उसमें बेहद कमी दिखाई देती है वे अच्छे वक्ता हो सकते हैं पर अच्छे वक्ता के साथ उनके बयानों की सच्चाई भी ठोस ही होनी चाहिए क्योंकि देश के पीएम से इस तरह के बयानों की अपेक्षा कोई भी नहीं करता है.
                              यह सब उसी तरह का मामला लग रहा है जैसा कोयला ब्लॉक नीलामी में खुद पीएम की तरफ से कहा गया था जिसमें उन्होंने अगले तीस वर्षों में सरकार को खनन होने की दिशा में मिलने वाले राजस्व के बारे में लाखों कार्डों रुपयों के लाभ की बात कही थी पर आज के सन्दर्भ में इन लाखों करोड़ों रुपयों में से राज्य सरकारों कि कितना मिलने वाला है इस पर उन्होंने कुछ भी नहीं कहा था ? एलपीजी में डीबीटी लागू होने से निश्चित तौर पर सरकार को लाभ होने वाला है पर क्या वह इतने बड़े पैमाने पर हो सकता है कि पीएम जिसे १२,७०० करोड़ कहें वही इस मुद्दे पर काम करने वाली संस्था की नज़रों में केवल १४३ करोड़ रूपये ही हो ? इस मुद्दे पर सरकार और उसके सम्बंधित मंत्रालय भी पूरी तरह से चुप्पी लगाये हुए हैं जिससे इस संस्था द्वारा आंकड़ों के माध्यम से सवालिया निशान लगाये जाने को काफी हद तक सही माना जा सकता है भले ही वे इतने कम स्तर पर न भी हों. केंद्र सरकार को यह बात समझनी ही होगी कि आज वह समय नहीं है जिसमें सरकारें गोपनीयता के नाम पर कुछ भी आसानी से छिपा लिया करती थीं क्योंकि जनता के हाथों में सूचना के अधिकार के तहत मज़बूत हथियार आया हुआ है जिससे हर सरकार बंधी हुई है.
                             पीएम के स्तर पर दिए गए बयानों में विश्वसनीयता होनी ही चाहिए इससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता है पर उनके बयानों के लिए सूचनाएँ एकत्रित करने वाले समूह को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि वे देश के पीएम के लिए कुछ लिख रहे हैं और इस तरह के गलत बयानों से भले ही कुछ देर के लिए पीएम की वाहवाही हो जाये पर देश में कोई भी सरकार के किसी भी आंकड़े को परखने के लिए कहीं से भी आगे आ सकता है. यदि सरकार और पीएम के अनुसार देश का इतना पैसा बचा है तो यह बहुत अच्छी बात है और यह इस योजना के बारे में शुरुवाती सोच विकसित करने वाली मनमोहन सरकार की उस टीम की देश के लिए की गयी एक महत्वपूर्ण पहल भी है जिसके माध्यम से सरकार इस क्षेत्र के भ्रष्टाचार को रोकने में काफी हद तक सफल हो पायी है. सही नीतियों को सफलता पूर्वक देशहित में आगे बढ़ाने की आवश्यकता को ध्यान में रखना ही चाहिए पर साथ ही पीएम को खुद भी इस तरह के आंकड़ों को सार्वजनिक करने से पहले अपनी एक विश्वस्त टीम से इनकी पुष्टि करवाने के बारे में भी सोचना चाहिए. शीर्ष स्तर से इस तरह के भ्रामक आंकड़ों को जारी करने से देश की सही स्थिति का आंकलन कर पाने किसी के लिए भी कठिन ही होने वाला है.                  
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