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Thursday, 8 October 2015

आधार का कानूनी आधार ?

                               देश के आम लोगों की पहचान और सुविधा को लेकर यूपीए सरकार द्वारा शुरू की गयी महत्वकांक्षी और महत्वपूर्ण आधार संख्या जिस तरह से नेताओं की कमज़ोर इच्छाशक्ति के आगे घुटने टेकती हुई दिखाई दे रही है उससे यही लगता है कि आने वाले समय में भी इस सम्पूर्ण प्रणाली का उस तरह से उपयोग संभव नहीं हो पायेगा जैसा सरकार और पहचान के संकट से जुड़े हुए देश के अन्य संस्थान सोचते हैं. यूपीए सरकार ने देश के नागरिकों की सुविधा और सरकारी योजनाओं के दुरूपयोग रोकने और सही क्रियान्वयन के लिए जिस तरह से आधार को आगे किया था और उसे एक अभियान के तौर पर आगे ले जाने का निश्चय किया था वह अपने आप में महत्वपूर्ण कदम तो था पर संभवतः उस समय सरकार ने यह नहीं सोचा था कि आने वाले समय में इस तरह से निजता का उल्लंघन करने के नाम पर आधार की राह में रोड़े अटकने का काम भी शुरू किया जा सकता है. इसमें जिस तरह से व्यापक प्रारूप में लोगों से उनकी सम्पूर्ण जानकारी एकत्रित की जा रही है वह सरकारों के लिए महत्वपूर्ण है पर कुछ लोगों ने इस निजता का मामला बनाकर सुप्रीम कोर्ट तक बात पहुंचाई जिससे मामले को बड़ी संवैधानिक पीठ के पास भेज दिया गया है.
                           इस बारे में केंद्र सरकार के पास अब कितने विकल्प शेष बचे हैं केवल उस पर ही विचार किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक सही तरह से कानून में बदलाव नहीं किया जायेगा और कोर्ट में उसकी नए कानून के अनुसार सही तरह से पैरवी नहीं की जाएगी तब तक इसे पूर्ण रूप से नागरिक पहचान की मान्यता नहीं मिल सकती है. आज कानूनी रूप से किसी भी नागरिक की निजता का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है और यही नागरिक अधिकार आधार के रास्ते में आ रहा है पर केंद्र सरकार इसे एक नए विधेयक के तहत कानूनी मान्यता देने के बारे में सोच भी सकती है. अच्छा हो इसके लिए एक संसदीय समिति का गठन किया जाये और उसको परामर्श देने के लिए कानूनी और अन्य विशेषज्ञों की एक टीम भी बनायीं जाए जिससे एक समय सीमा में नए विधेयक पर विचार करने के लिए कहा जाये इस समिति की रिपोर्ट आने के बाद उस विधेयक को पारित कराने के बारे में विचार किया जाए जिससे आने वाले समय में इस आधार को विभिन्न योजनाओं में एक पहचान के रूप में कानूनी मान्यता भी मिल सके. केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट से भी इस मामले में आग्रह करना चाहिए की इस पूरे मामले को देखने के लिए शीघ्र ही उसकी तरफ से एक संवैधानिक पीठ का गठन कर दिया जाये जिससे सुनवाई शुरू की जा सके.
                          इस मामले में जो चूक यूपीए सरकार ने की थी अब एनडीए के द्वारा भी उसी तरह का काम किया जा रहा है इसलिए इस पूरी समस्या से निपटने के लिए सरकार को सभी दलों और देश के अग्रणी संस्थानों के साथ विचार करके आने वाले विधेयक पर विचार करना चाहिए. आधार की पहचान के बाद देश के संसाधनों में खुली लूट मचाने वालों के लिए एक मज़बूत लगाम सरकार को उपलब्ध हो जाएगी तथा किसी भी महत्वपूर्ण योजना के बारे में सरकार को इतना अधिक विचार नहीं करना पड़ेगा. आज जब देश के कई राज्यों में पंचायती चुनाव भी चल रहे हैं तो वहां किस तरह से मतदाताओं ने अपने शहरों के वर्तमान निवास स्थान के साथ ही पैतृक गांवों में भी वोट बनवा रखे हैं यह किसी से भी छिपा नहीं है यदि वोटर लिस्ट को आधार से जोड़ दिया जाये तो फ़र्ज़ी मतदाताओं की समस्या से एक बार में ही छुटकारा मिल सकता है क्योंकि उस व्यवस्था में वोटर के पास एक विकल्प चुनने का अवसर ही होगा. केंद्र सरकार को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ तक मामले के जाने से पहले ही इसे मज़बूती कानूनी कवच देने की आवश्यकता पर अविलम्ब विचार करना चाहिए क्योंकि पहचान और निजता के पीछे छिपकर भ्रष्टाचार करने के लिए अब और समय देने की स्थिति में देश नहीं है.                               
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