मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 5 November 2015

अब शाहरुख़ पर निशाना ?

                                                        लगता है कि एक रणनीति के तहत ही पीएम मोदी और अमित शाह ने अपने बड़बोले और असभ्य नेताओं को कुछ भी बोलने की स्पष्ट रूप से छूट दे रखी है क्योंकि इस गुजराती जोड़ी का जो ख़ौफ आज भाजपा में है उसे देखते हुए पार्टी से जुड़े हुए किसी भी नेता की हिम्मत इतनी नहीं हो सकती है कि वे इन दोनों नेताओं की मंशा के विपरीत जाकर कुछ बयानबाज़ी कर सकें. देश में असहिष्णुता सदैव ही रही है और संभवतः दुनिया का कोई भी ऐसा देश या स्थान नहीं होगा जहाँ विभिन्न मुद्दों पर इस तरह की बातें करने वाले लोग न पाये जाते हों ? आदि काल से ही भारत में सहिष्णुता के साथ असहिष्णुता भी प्रभावी रही है जिससे विभिन्न मुद्दों पर जागृत समाज का एहसास होता रहता है निश्चित तौर पर आज़ादी के बाद से देश ने बहुत सारे ऐसे मुद्दे भी देखे हैं जिन पर लोगों की विचारधाराएँ आपस में टकराती रही हैं पर संभवतः पहली बार ऐसा हो रहा है कि असहिष्णुता के बारे में बोलने पर लोगों की आलोचना में भी भाजपा और हिंदूवादी संगठन धर्म का विचार कर हमला करने के लिए तैयार बैठे हैं. यह सब तब हो रहा है जब पीएम मोदी की तरफ से कहने भर का एक खोखला और औपचारिक सन्देश पार्टी नेताओं को दिया जा चुका है कि वे देश के सभी नागरिकों का सम्मान करें.
                     फिल्म कलाकार शाहरुख़ खान ने जिस तरह से अपने जन्मदिन पर पत्रकारों के पूछने पर धार्मिक उन्माद और असहिष्णुता के मुद्दे पर अपनी राय रखी और उसके बाद हिंदूवादी संगठनों और भाजपा के मंत्रियों तक ने कुछ भी बोलना शूरु कर दिया उससे भाजपा की मानसिकता का ही पता चलता है क्योंकि यदि मोदी और शाह इस मामले अपनी बात के अनुपालन को लेकर में थोड़े भी गंभीर होते तो संभवतः इसे रोकना उनके लिए मुश्किल नहीं था पर आज खुद को राष्ट्रवादी कहलाने वाली भाजपा जिस तरह से अपनी परिभाषा वाले राष्ट्रवाद को ही पूरे देश पर थोपने के लिए तैयार दिखाई दे रही है उसको भाजपा और सरकार के शीर्ष नेतृत्व का पूरा समर्थन हासिल है. क्या शाहरुख़ या किसी भी अन्य मुसलमान के असहिष्णुता पर बात करने को सदैव पाकिस्तान से जोड़ने की मंशा भाजपा के उस द्वन्द को नहीं दिखाती है जो बिहार चुनावों को लेकर उसके मन में चल रहा है ? एक तरफ कैलाश विजयवर्गीय जैसे नेता कुछ भी बोलते हैं और अगले दिन ही खेद व्यक्त करते हैं तो दूसरे दिन हिंदूवादी संगठनों से जुड़े हुए लोग मोर्चा संभालते हैं क्योंकि इस मुद्दे पर भाजपा के लिए खुद को बचा पाना कठिन हो जाता है और भाजपा से इतर किसी भी व्यक्ति की राय पर वह जवाबदेह भी नहीं है.
                     क्या इस तरह के माहौल में जो भाजपाई नेता असहिष्णुता के मुद्दे पर बुद्धिजीवियों द्वारा अपने सम्मान लौटाए जाने पर आक्रामक दिखाई दे रहे हैं वे इतनी समझ भी रखते हैं कि केवल इनके सम्मान लौटाए जाने से ही भारत की छवि धूमिल नहीं हो रही है भारत की मज़बूत लोकतान्त्रिक छवि हर उस राष्ट्रीय समस्या पर धूमिल हुई जब हम विधि द्वारा स्थापित अपने संविधान में वर्णित तत्वों के अनुरूप काम नहीं कर पाये. उसके लिए यदि घटनाओं की सूची बनायीं जाये तो उससे केवल सामजिक सद्भाव को ही ठेस पहुँचने वाली है. देश में चाहे किसी भी दल का शासन रहा हो पर जब भी किसी मुद्दे पर अराजकता के साथ कुछ समूहों ने मनमानी की है भारत के लिए वे सभी पर शर्मिदा करने वाले ही हैं सरकार चला रहे लोगों पर इस बात से निपटने का अधिक दबाव रहा करता है क्योंकि जब भी देश में कुछ होता है तो जो सत्ता में हैं उनको ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सवालों का सामना करते हुए अपने जवाब देने पड़ते हैं. खुद पीएम मोदी जिन प्रयासों से भारत के लिए विभिन्न तरह के आयामों को बढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं और भारत की आर्थिक प्रगति के सपने लेकर आगे बढ़ना चाह रहे हैं उस पर पानी फेरने का जितना काम संसद में विपक्षी दल कर रहे हैं उससे अधिक संघ और उसकी विचारधारा से जुड़े हुए लोग कर रहे हैं. अब पीएम को यह तय करना ही होगा कि वे इनमें से किस पक्ष में हैं क्योंकि ज्वलंत मुद्दे राष्ट्र चला रहे लोगों से कुछ उन सवालों के जवाब भी मांगते हैं जो उन्हें सदैव ही असहज कर देते हैं.      
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