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Thursday, 25 February 2016

महत्वपूर्ण मुद्दे और संसद

                                                                      देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में सरकारों के बढ़ते दखल को लेकर जिस तरह से पूरे देश में ध्रुवीकरण देखा जा सकता है उसको समझने की आवश्यकता को किनारे करते हुए एक बार फिर से हमारे सांसदों ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे को भी अपनी पार्टी लाइन से आगे बढ़ने ही नहीं दिया जिससे देश के सामने एक संभावित व्यवस्था पर गंभीर चर्चा के माध्यम से जो कुछ हासिल करने का अवसर था वह भी केवल दलीय राजनीति में उलझ कर ही रह गया. इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर किसी भी दल के सांसद ने पार्टी लाइन को छोड़ना मुनासिब नहीं समझा जबकि यह पूरे देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में सुधार के लिए एक महत्वपूर्ण कार्ययोजना के नींव स्थापित करने का काम कर सकता था. आज लगभग हर दल में हर श्रेणी के वक्ता उपलब्ध हैं पर उनको अन्य मुद्दों पर अपने वाक् कौशल के प्रदर्शन का अवसर सदन में मिलता ही रहता है फिर भी इतने संवेदनशील मुद्दे पर केवल चर्चा से क्या मसले का समाधान खोज जा सकता है ? क्या दलित और राष्ट्रवाद से आगे बढ़कर कोई ऐसे मुद्दे नहीं हैं जो छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए आगे बढ़ने से रोकते हैं पर उन पर किसी तरह की चर्चा आखिर क्यों नहीं की जाती है ?
                                     इस पूरे प्रकरण में यदि चर्चा की शुरुवात में ज्योतिरादित्य सिंधिया और अनुराग ठाकुर के वक्तव्यों को देखा जाये तो उन्हें दोनों दलों के हिसाब से बहुत अच्छा कहा जा सकता है पर जिस तरह से कांग्रेस की तरफ से सरकार को केवल दलित और छात्र विरोधी साबित करने की कोशिशें की गयीं उसी तरह से सरकार ने कांग्रेस पर देशद्रोहियों का साथ देने का आरोप लगाने में ही पूरा समय खर्च कर दिया. यह सही है कि सदन में विपक्षी बेंचों पर इस तरह कि बहस में अनुभवी और कुशल वक्ताओं की कमी देखी जा सकती है क्योंकि लगभग सभी दलों के अच्छे वक्ता पिछले चुनावों में सदन तक नहीं पहुँच पाये थे पर नए लोगों को तथ्यों पर आधारित बातें करने की तरफ जाना चाहिए और केवल सरकार को घेरने का एकमात्र उद्देश्य बनाने के स्थान पर बहस से कुछ अच्छा निकालने के बारे में भी सोचना चाहिए. बहुत दिनों या संभवतः पहली बार ही ऐसा होगा कि विपक्ष से अधिक सत्तापक्ष सदन में आक्रामक रहने की कोशिशें करता हुआ नज़र आता है जिससे अब बचने की आवश्यकता भी है क्योंकि कल की बहस में कई बार सत्ता पक्ष की तरफ से अनावश्यक हस्तक्षेप के चलते स्वयं सुमित्रा महाजन को भी व्यवस्था बनाये रखने के लिए सत्ता पक्ष को झिड़कियां देनी पड़ीं.
                                            इस बात पर अब समय आ गया है कि संसद के दोनों सदनों के अध्यक्ष/ सभापति की तरफ से एक विशेष चर्चा के बारे में सभी दलों से विचार करने के बाद एक बार फिर से गंभीर विमर्श करना चाहिए क्योंकि कल की बहस से देश को कुछ भी हासिल नहीं हुआ और वे मुद्दे और प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही रह गए जिनके लिए इस चर्चा को शुरू किया गया था. क्या इस बहस से विश्वद्यालयों के बारे में कोई ठोस निर्णय सामने आया या फिर सदन के अंदर सत्ता और विपक्ष ने एक दूसरे को नीचा दिखाने में एक बार फिर से वही पुरानी होड़ करके अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली ? देश के व्यथित लोगों को संसद से कुछ जवाब चाहिए थे पर उसकी जगह क्या उनकी अपेक्षाओं को इस चर्चा ने पूरा किया या फिर विपक्ष की ज़िद और सरकार के बयानों के नीचे दबकर असली मुद्दे फिर से वहीं पर नहीं पहुँच गए जहाँ से वेमुला की आत्महत्या के बाद शुरू हुए थे ? विपक्ष सदन में सर्कार को अच्छे से घेर सकता है और सरकार भी उन आरोपों का मज़बूती से जवाब दे सकती है पर क्या इससे उन समस्याओं का समाधान हो पाता है जिसके लिए यह विशेष चर्चा जनता के पैसों को खर्च करने की गयी थी ?      
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