मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 26 July 2010

मानसून सत्र और हंगामा...

संसद के मानसून सत्र में विपक्ष के कड़े तेवरों के चलते कुछ ठोस काम काज होने की सम्भावना कम ही नज़र आ रही है. आज के समय कुछ ऐसा माहौल ही बनता जा रहा है कि देश में संसद समेत सभी राज्यों की विधान सभाओं तक में ठोस और विचारशील बहस के स्थान पर अराजकता हावी होती जा रही है. देश के सामने बहुत से ज्वलंत मुद्दे हैं पर लगता है कि सांसदों को केवल अपने हंगामे से ही मतलब रह गया है. जिस तरह से मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने कार्य स्थगन प्रस्ताव रख कर मंहगाई पर चर्चा करने की मांग की है उससे तो यही लगता है कि आने वाले समय में यह पूरा सत्र ही हंगामे की भेंट चढ़ने वाला है.
         एक बात तो तय है कि एक विधेयक को यह संसद बिना किसी बहस और हंगामे के पारित करनी वाली है वह है सांसदों के वेतन भत्ते में बढ़ोत्तरी. इसके अतिरिक्त भाजपा ने परमाणु सुरक्षा दायित्व विधेयक को लेकर पहले काफी बयान बाज़ी की है पर लगता है कि वह पूरे हंगामे के मूड में है. अब जब इस महत्वपूर्ण विधेयक पर चर्चा का समय है तो संसद में कुछ ठोस करने की इच्छा शक्ति बची है क्या ? किसी भी दल को अगर इस बिल पर आपत्तियां हैं तो उन्हें इस पर पूरी बहस में भाग लेना चाहिए जिससे सरकार के सामने उनकी वास्तविक चिंताएं आ सकें.
     सरकार पर कुछ मुद्दों पर विपक्ष का हमला ठीक भी होगा जैसे मंहगाई के मुद्दे पर पूरा विपक्ष एक जुट हो जायेगा वहीं महिला आरक्षण विधेयक पर भाजपा, बसपा सरकार के साथ होंगीं. वर्तमान में गुजरात के मंत्री अमित शाह का मामला जहाँ भाजपा को परेशान करेगा वहीं रेल दुर्घटनाएं और दूरसंचार घोटाले में सरकार की पूरी किरकिरी होने की सम्भावना है. अच्छा तो यह रहेगा कि सभी मुद्दों पर ठीक तरह से बहस करने को प्राथमिकता दी जाये साथ ही हंगामे और संसद को ठप करने से बचा जाये. एक काम जो अवश्य होना चाहिए कि संसद सत्र के दौरान कुछ ठोस काम ना करने पर सांसदों के वेतन भत्तों में कटौती भी की जाये  ? आख़िर कर दाता के पैसों के दुरूपयोग का अधिकार इन सांसदों को कहाँ से और किसने दे दिया है ? साफ़ तौर पर हंगामा करने के लिए जुर्माने का प्रस्ताव भी होना चाहिए और बिना पूर्व अनुमति के हर मसले को प्रश्न कल में उठाने और गतिरोध पैदा करने वाले सांसदों को चिन्हित कर उनके वेतन भत्तों पर रोक लगा दी जानी चाहिए. जब वे देश को चलने के लिए महत्वपूर्ण मसलों पर एक नहीं हो सकते हैं तो उनको बैठे बैठाये अब जनता वेतन भी नहीं देना चाहती है.    

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