मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 20 August 2010

कश्मीर की तकलीफ़

कांग्रेस संसदीय दल की बैठक को संबोधित करते हुए सोनिया गाँधी ने प्रधानमंत्री से आम कश्मीरियों के दिल की बात सुनने की अपील की साथ ही यह भी कहा कि आपके द्वारा किये जा रहे सार्थक प्रयासों से वहां की स्थिति में जल्दी ही बदलाव भी देखने को मिलेगा. सोनिया ने कहा कि वहां की ज़मीनी स्थिति का सही आंकलन किये बिना कोई भी प्रयास कामयाब होने वाला नहीं है. उन्होंने कहा कि कश्मीर की युवा पीढ़ी अपने को अलग थलग महसूस कर रही है और उसके इसी अलगाव को जुड़ाव में बदलना ही होगा. देश के विकास की इबारत में कश्मीर की भी भागीदारी होनी चाहिए. सोनिया ने कश्मीर में काम कर रहे सुरक्षा बलों के जवानों की तारीफ़ करते हुए भी कहा कि वे विपरीत परिथितियों में काम कर रहे है और किसी भी तरह से उनका मनोबल भी ऊंचा रखा ही जाना चाहिए क्योंकि वहां की शांति और सुरक्षा में इन जवानों ने बहुत बड़ा योगदान किया है.

       यह सही है कि इस तरह के किसी भी अच्छे प्रयास से कश्मीर में कुछ समय के बाद बदलाव देखने को तो ज़रूर मिलेंगें पर आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि किस तरह से नेताओं पर वहां की जनता का भरोसा लौटाया जाये ? आज देश की विश्वसनीयता का शायद ही कोई संकट हो पर जिस तरह से बेरोजगारी के बीच वहां पर भ्रष्टाचार की बातें सामने आती हैं वे निश्चित तौर पर अपने भविष्य के लिए चिंतित किसी भी युवा मन को विचलित कर सकती हैं ? आज हर समस्या में कहीं न कहीं एक भ्रष्टाचार का पेंच ज़रूर घुसा रहता है जो कि किसी भी अच्छे प्रयास पर बहुत आसानी से पानी फेर देता है. अब समय है कि किसी भी तरह से इस भ्रष्टाचार के घुन को देश से निकाल फेंकना होगा. कश्मीर के साथ एक समस्या और भी है कि वहां पर जिस तरह से केंद्र सरकारें बराबर पैसा देती रहती हैं और उन पर कोई कड़ा नियंत्रण नहीं होता जिससे भ्रष्टाचारियों की मौज हो जाती है. वहां पर सुरक्षा के नाम पर बहुत बड़ा खर्चा हर जगह होता रहता है और यह सारा खर्चा ऐसा होता है जिसके बारे में कुछ भी साबित नहीं किया जा सकता है. कश्मीर में धारा ३७० के तहत बाहर के लोगों के लिए काम पाना असम्भव है तो फिर वहां पर कौन कश्मीर की जड़ों को खोखला कर रहा है ? ज़ाहिर है यह काम भी कश्मीर के लोग ही कर रहे हैं अब समय आ गया है कि इन लोगों की पहचान खुद कश्मीरी लोग ही करें और अपने विकास के मानक खुद ही तय करें.
       कश्मीर में शांति तभी आ सकती है जब वहां के लोग चाहेंगें ? बाहर से केवल समस्या को सुलझाने के लिए आवश्यक सामन जुटाया जा सकता है पर समस्या तो वहीं से सुलझेगी जहाँ से वह शुरू हुई है ? अब समय आ गया है कि केंद्र और राज्य सरकार द्वारा चलाये जा रहे कार्यकर्मों में आम कश्मीरी अपनी भागीदारी बढ़ाये तभी वह कश्मीर की भलाई कर सकता है. हाथ में पत्थर उठाकर आने वालों को डराकर केवल कश्मीर और कश्मीरियों के हितों को चोट पहुँचती है....... 
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