मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 27 August 2010

अब यहाँ भी नक़ल ?

यह एक ऐसी खबर जिस पर शायद पूरे राष्ट्र को शर्म आये फिर भी एक ऐसा क्षेत्र जिसके बारे में आज भी देश के आम जनों को बहुत भरोसा है कि यहाँ पर आज भी सब ठीक चलता है ? आंध्र प्रदेश के वारंगल जिले में २४ अगस्त कानून की स्नातकोत्तर परीक्षा में विशेष चल निरीक्षक दल ने ५ वर्तमान न्यायाधीशों को नक़ल करते पकड़ा. यह सभी लोग परीक्षा के दौरान नकल की सामग्री के साथ थे. एक के पास पूरी पुस्तक तो बाकी के पास नक़ल के रूप में पुस्तक के पन्ने और नक़ल की पर्चियां बरामद हुईं. आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद काकरू ने इन पाँचों  निलंबित कर दिया है.
            सवाल यहाँ पर यह नहीं है कि कौन नक़ल करते पकड़ा गया है पर सवाल यह बहुत बड़ा है कि जिस पर लोगों की समस्याओं को न्याय पूर्वक सुलझाने की ज़िम्मेदारी आने वाली है और जो वर्तमान में भी इस पद पर बैठ कर लोगों को न्याय दिलाने के लिए हों आखिर वे इस तरह से कैसे अनीति पूर्वक काम कर सकते हैं ? जिस पद पर बैठने के लिए वे इस तरह के गलत काम करने से नहीं चूक रहे हैं तो वे न्यायमूर्ति बनने के बाद किस तरह से न्याय कर सकेंगें ? यह सही ही है कि इन सभी को निलंबित कर दिया गया है बल्कि इनके लिए जांच के बाद केवल निलंबन ही  पर्याप्त नहीं होगा इन सभी को जाँच पूरी होने पर सेवा से मुक्त कर दिया जाना चाहिए. ऐसी परिस्थिति में किसी के भी छूट जाने पर एक गलत परंपरा की शुरुआत हो जाएगी और फिर ऐसे पता नहीं कितने दाग़ी लोग न्याय की जगह अन्याय करते रहेंगें. इस मामले में पूरी निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है क्योंकि अगर बिना सही ढंग से जांच किये इनको सजा दी जाती है तो वह इनके अधिकारों का उल्लंघन होगा ? जब इन्होंने अपने कर्तव्यों का अनुपालन नहीं किया तो ये किसी भी अधिकार के पात्र नहीं रह जाते हैं ? 
             भ्रष्टाचार और आगे बढ़ने की सनक ने लोगों को कहाँ तक पहुंचा दिया है यह मामला इसका ताज़ा उदाहरण ही है. किसी भी प्रकार से आगे बढ़ने की ललक पता नहीं लोगों से क्या क्या करवा देती है ? केवल इन पांच लोगों की तरफ ऊँगली उठाने से काम नहीं चलने वाला है क्योंकि यह सब भी हमारे इसी भ्रष्ट होते समाज का हिस्सा हैं ? जब पूरा समाज ही किसी भी प्रकार से आगे बढ़ने को लालायित हो रहा है तो हमारा यह वर्ग इससे कैसे अछूता रह पायेगा ? आज आवश्यकता है कि समाज में नैतिक मूल्यों की फिर से स्थापना की जाये और इस तरह से किसी भी छोटे मार्ग से आगे जाने वालों को हतोत्साहित किया जाये ? पर क्या समाज आज इस स्थिति में रह भी गया है कि वह अपनी बात खुद सुन भी पाए ?
 
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