मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 4 April 2011

सूफियों दरगाहों पर हमले


               पाक में एक बार फिर से आतंक ने अपना घिनौना चेहरा दिखाना शुरू कर दिया है. पाकिस्तानी पंजाब प्रान्त के डेरा ग़ाज़ी खान से ३० किमी दूर स्थिति साखी सरवर दरगाह के मुख्य गेट और फिर अन्दर हुए दो विस्फोटों ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया है. इस घटना में ३० लोग मरे गए और १०० से अधिक घायल हुए हैं. तालिबान और अन्य कट्टर आतंकी समूह दरगाहों को गैर इस्लामी मानते हैं जिसके विरोध में वे पाकिस्तान में विभिन्न स्थानों पर स्थिति इन सूफी संतों की दरगाहों पर हमले करते रहते हैं. पाक में जिस तरह से अभी तक सरकारी स्तर पर आतंक को पनाह दी जाती है उसे और कोई अच्छा परिणाम सामने आना वाला भी नहीं है क्योंकि जब नफ़रत फ़ैलाने को सरकारी स्तर पर पूरा समर्थन दिया जाता है उससे कुछ अच्छा नहीं हो सकता है और पाकिस्तान आज भी यह बात समझना नहीं चाहता है.

        भारतीय उप महाद्वीप में इस्लाम के आने के समय से ही इन सूफी संतों को बहुत पूज्यनीय माना जाता है और जिसके कारण इनके मानने वालों में धर्म की कोई बात ही नहीं होती है पर शायद कट्टरपंथियों को यह बात अच्छी नहीं लगती होगी कि इन दरगाहों पर मुसलमान भी अन्य धर्मों के लोगों के साथ जाते हैं और सर झुकाते हैं ? ऐसा करने से उन्हें लगता है कि ये मुसलमान कहीं न कहीं से धर्म से दूर होते जा रहे हैं ? भारत की संस्कृति और सभ्यता का एक अंग होने के कारण पाकिस्तान का आम जनमानस भी आज भी काफी हद तक उसी मानसिकता से प्रभावित है पर बाहर से आये और इस्लाम को थोपने का प्रयास करते हुए तालिबान यह भूल जाते हैं कि जो ताना बाना लोगों के दिलों में सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा है उसे तोड़ना इतना आसान नहीं है. हाँ  इतना अवश्य है कि सरकारी उदासीनता के चलते अगर किसी समय लोग अपनी जान बचाने के लिए इन दरगाहों पर जाना छोड़ दें तो शायद तो इन आतंकियों की इस बात पर जीत हो सकती है.
        लगता है कि तालिबान ने पूरी दुनिया में मुसलामानों को पूरी तरह से पिछड़ा और कट्टर साबित करने की कसम खा रखी है अभी तक जिस तरह से इस्लाम दुनिया के साथ चल रहा था अब लगता है कि तालिबान के इशारे पर उसे अलग से चलने को कहा जा रहा है और दुःख की बात यह है कि अपने को इस्लाम का पुरोधा बताने वाला पाकिस्तान ही इस तरह की गतिविधियों में लिप्त होकर इस्लाम की व्यापकता और स्वीकार्यता की जगह संशय फ़ैलाने का काम कर रहा है. इस्लाम के नाम पर मांगे और बनाये गए पाकिस्तान से तो इस तरह की आशा पूरे विश्व ने नहीं की थी पर अब जब पाकिस्तान ख़ुद ही इस तरह की बातों को प्रोत्साहन देकर इस्लाम के बारे में पूरी दुनिया के सामने एक कट्टर और अलग सी तस्वीर पेश कर रहा है तो फिर कहाँ से इस्लाम की रौशनी को फ़ैलाने वाले आयंगें ? भारत ने सदैव से ही अपने में हर एक को पनाह दी है यही कारण है कि पाकिस्तान से आने वाला कोई भी व्यक्ति अजमेर शरीफ और हज़रत निजामुदीन के यहाँ पर अपना माथा ज़रूर टेकना चाहता है ? मुशर्रफ जब भारत आये थे तो वे भी अजमेर शरीफ जाना चाहते थे पर शायद उनके दोगले पन को सूफियों ने देख लिया और वे वहां जाने की हसरत लिए हुए ही वापस हो गए थे.      

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