मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 16 April 2012

तालिबान और आतंक

         जिस तरह से तालिबान ने अफ़गानिस्तान में सुनियोजित तरीके से हमले किये उसके बाद भी अगर किसी को यह लगता है कि तालिबान कहीं से कमज़ोर है तो यह उसकी कमज़ोर सोच को ही दर्शाता है क्योंकि पूरी दुनिया में विद्रोहियों के पास इस छापामार शैली में लड़ाई लड़ना सबसे कारगर रहा है क्योंकि इसमें कुछ लोगों के सहारे ही बड़ी संख्या में जानमाल को नुकसान पहुँचाया जा सकता है और आत्मघाती हमलों के कारण कहीं से भी कुछ राज़ खुलने का ख़तरा भी नहीं रहता है. अफ़गानिस्तान पिछले ३ दशकों से आतंकियों की प्रयोगशाला रहा है कभी वहां पर रूस के खिलाफ संघर्ष चल रहा था तो आज पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़.. पर इस पूरी लड़ाई में जिस तरह से अफ़गानिस्तान पीछे छूटता जा रहा है उसके बारे में कोई भी नहीं सोचना चाहता है ? केवल सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के कारण ही अफ़गानिस्तान को इतने सारे संघर्ष देखने पड़ रहे हैं जबकि वास्तव में वहां के स्थानीय निवासियों का इससे कुछ भी लेना देना नहीं है. हर तरह की लड़ाई में जिस तरह से वहां की प्राकृतिक और भागोलिक परिस्थितियां छापामार शैली के युद्ध के लिए अनुकूल हैं आतंकी आज उसका पूरा लाभ लेना चाहते हैं. आज भी शांति होने पर अफ़गानिस्तान के ये इलाके पर्यटन के लिए नए केंद्र बनने का मदद रखते हैं.
         किसी भी देश के पुनर्निर्माण में बहुत सारे संसाधनों की आवश्यकता होती है पर जिस तरह से अफ़गानिस्तान को कब्रिस्तान में बदल दिया गया है तो उसको फिर से खड़ा करने के लिए कुछ विशेष प्रयासों की भी ज़रुरत है. तालिबान को यह लगता है कि पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ स्थानीय कबीलों और जनता को भड़का कर वे एक बार फिर से यहाँ पर अपनी हुकूमत ला सकते हैं और सिर्फ इसलिए ही वे वहां पर किसी भी तरह के विकास के ख़िलाफ़ हैं क्योंकि जब विकास की झलक वहां के आम लोगों को दिखाई देगी और उनमें शिक्षा का प्रसार होगा तो आतंकियों के लिए उन्हें बरगलाना उतना आसान नहीं होगा. आज जिस तरह से तालिबान एक बार फिर से अपने पैर फ़ैलाने की कोशिश में लगा हुआ है उससे यही लगता है कि उसे फिर से एक सरकारी ठिकाने की कितनी आवश्यकता है जिसे पाक और कुछ अन्य अरब देश भी मान्यता दे सकें ? यह सारा काम वह अफ़गानिस्तान में अपनी सरकार बनकर ही कर सकता है जिससे उसे दुनिया के अन्य देशों के साथ बराबरी करने का अवसर भी मिल सके. जिस तरह से तालिबान ने लम्बे समय तक अफ़गानिस्तान में राज किया है उसके बाद उसको भी सत्ता का चस्का लगा हुआ है और अब पिछले १० सालों में पहली बार अफ़गानिस्तान में अन्य देशों की सैनिक उपस्थिति कम होने से उसके पास पलट कर वार करने का अवसर आया है.
        इस पूरे प्रकरण में जिस तरह से अफ़गानिस्तान की आम जनता का जीना दूभर हो गया है और वहां पर लगातार संघर्ष चलते रहने से भी जिस तरह से विकास पूरी तरह से ठप हो गया है उस स्थिति में अब दुनिया के सामने ऐसे कौन से मार्ग बचे हैं जिन पर चलकर वहां के नागरिकों को इस अँधेरे से निकालने में मदद की जा सके. जिस तरह से पिछले दशक में अफ़गानिस्तान में करज़ई सरकार से जनता का भरोसा कम हो रहा है उसके बाद तालिबान के लिए वहां पर अपने पैर जमाना कुछ हद तक आसान हो रहा है क्योंकि पूरी दुनिया से पुनर्निर्माण के लिए मिलने वाली धनराशि के उपयोग में जिस तरह से भ्रष्टाचार किया जा रहा है उसके बाद जनता में भी हताशा है. तालिबान वहां की कमज़ोर सरकार के इस कमज़ोर हिस्से को अपने पक्ष में करने के लिए हर तरह की कोशिशों में लगा हुआ है. पाक की जिस तरह से अफ़गानिस्तान सरकार में पूछ घटी है तो उसमें वह भी इन आतंकियों की पीठ पर अपना हाथ रखे हुए है क्योंकि अधिक परेशान होने पर अफ़गानिस्तान सरकार पाक से ही इन आतंकियों को समझाने के लिए कहा करती है ? अफ़गानिस्तान को जिस समग्र विकास की आवश्यकता है जब तक उसे ईमानदारी के साथ वहां पर नहीं किया जायेगा तालिबान अपने मतलब के लिए इस तरह के हमले करना बंद नहीं करेगा भले ही उसके इस प्रयास में निर्दोष मुसलमानों का कितना ही खून बहता रहे.      
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