मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 31 August 2012

असोम और शांति

            असोम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने जिस तरह से राज्य में दोबारा से जातीय हिंसा शुरू करने के लिए कुछ सगठनों को ज़िम्मेदार ठहराया है उससे यही पता चलता है कि अभी भी राज्य सरकार के पास काम करने की उतनी इच्छाशक्ति नहीं आ पाई है जो ऐसी परिस्थितियों में होनी ही चाहिए. यह सही है कि देश के विभिन्न राज्यों में विभिन्न कारणों से अलग अलग तरह से कानून व्यवस्था की समस्याएं सामने आती रहती हैं पर आज की राजनीति में क्षुद्र लाभ के लिए राज्य और देश के हितों को हमेशा से ही ताक़ पर रखने की एक परंपरा सी बन गयी है. जिस तरह से असोम में जातीय हिंसा में खुले तौर पर अफवाहों का सहारा लिया गया और उनका कुछ शक्तिशाली स्थानीय संगठनों ने समर्थन भी दिया उससे भी असोम में स्थिति और बिगड़ गयी. सभी जानते हैं कि असोम के रस्ते से भारतीय सीमा में बड़ी संख्या में बांग्लादेशियों ने घुसपैठ कर रखी है और राजनैतिक कारणों से वहां के नेता भी इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से परहेज़ करते हैं क्योंकि ये अब उनको एक वोट बैंक  के रूप में दिखाई देने लगे हैं जिससे स्थानीय लोग अपने को ठगा हुआ महसूस करते हैं.
            इस बात की शुरुवात कहाँ से हुई आज भी यह किसी को पता नहीं है पर देश के मुस्लिम समाज में जिस तरह से अफ़वाहों को फ़ैलाने का काम किया जाता है अब उसे तत्काल रोकने की ज़रुरत है क्योंकि किसी भी परिस्थति में अफवाहें स्थितियों को बिगाड़ने का काम ही करती हैं जिनसे कुछ भी हासिल नहीं हो पाता है. इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए अब साकार को कुछ ऐसे लोगों की मदद लेनी चाहिए जिनका मुस्लिन समाज में गहरा प्रभाव है. कर्नाटक, मुंबई और लखनऊ में जो कुछ भी हुआ उसका किसी भी तरह से समर्थन नहीं किया जा सकता है क्योंकि इस तरह की अराजकता देश के सामजिक ताने बाने को छिन्न भिन्न करने के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की आर्थिक स्वतंत्रता के लिए उपयुक्त देश की छवि को धक्का पहुंचाती हैं. सीधे सीधे जब इस तरह की बातों से पाक को ही लाभ मिलता दिखाई देता है तो देश के दक्षिणपंथी धुरे की राजनीति करने वालों को मुसलमानों पर देश विरोधी होने का ठप्पा लगाने का एक अवसर और मिल जाता है. देश में आज भी वे कौन से तत्व हैं जो किन्हीं स्वार्थों के लिए पाक के एजेंडे को लागू करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं सरकार को अन्य उपायों के स्थान पर उनको चिन्हित करने का प्रयास करना चाहिए.
            देश के अधिकांश भागों में सभी धर्मों के लोग शांतिपूर्वक रह रहे हैं और इस तरह की छुट-पुट घटनाएँ किसी ने किसी स्तर पर उनके मन में भी संदेह को उत्पन्न करती हैं क्योंकि जिन पड़ोसियों के साथ रहा जा रहा है आख़िर किसी और की सज़ा उनको कैसे दी जा सकती है. सभ्य समाज में इस तरह की गतिविधियों को इजाज़त नहीं दी जा सकती है क्योंकि देश दुनिया के साथ आगे बढ़ रहा है और यहाँ पर मध्यकालीन बर्बरता के साथ किसी को भी रहने की अनुमति नहीं है. देश के संविधान और देश की राजनीति का घालमेल करने के कारण ही आज अधिकतर जगहों पर इस तरह की समस्या सामने आ जाती है. असोम का मामला पूरी तरह से जातीय मामला है और वहां पर आम लोगों में अधिक राजनैतिक सक्रियता के कारण वर्चस्व की लड़ाई होती रहती है पर इस बार इस राजनीति को जिस तरह का रंग देने की कोशिश की गयी उससे पार पाने का कोई कारगर रहता अब असोम को ही खोजना होगा क्योंकि बिना सरकारी सख्ती और बांग्लादेशियों की घुसपैठ के अब इस समस्या का समाधान निकाल पाना आसान नहीं है. जम्मू कश्मीर, बांग्लादेश एक साथ की अंतर्राष्ट्रीय सीमा को सील किये जाने के बाद पाक के लिए अब भारत में घुसपैठिये भेजना उतना आसान नहीं रह गया है तो वह इस तरह की हरकतें करके देश में समस्याएं खड़ी करना चाहता है.      
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