मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 10 December 2012

फतवा ज़रूरी या स्वैच्छिक ?

               दुनिया में मुसलमानों की आबादी के अनुसार उनकी समस्याओं के समाधान के लिए पूछे जाने वाले सवालों और उनके जवाबों को लेकर आम तौर पर अभी तक यही माना जाता है कि ये सभी मुसलमानों के लिए बाध्यकारी होते हैं पर दिल्ली के कई इस्लामिक केन्द्रों के वरिष्ठ लोगों ने जिस तरह से फतवे पर स्पष्टीकरण दिया है वह आम मुसलमान और अन्य लोगों के लिए भी जानकारी भरा है. आम तौर पर फतवे के बारे में यही धारणा है कि यह आम मुसलमान के लिए बाध्यकारी है पर असलियत इससे बिलकुल अलग है. किसी खास मसले पर इस्लाम के अनुसार किस तरह का व्यवहार किसी मुसलमान को करना चाहिए इस बात का निर्णय मुफ्ती द्वारा दिया जाता है जो कि इस्लाम के अनुसार पवित्र क़ुरान शरीफ़ और हदीस के आधार पर अपना निर्णय देते हैं. अभी तक आम तौर पर यही माना जाता है कि किसी भी मसले पर दिया गया फतवा हर मुसलमान पर बाध्यकारी होता है जबकि असलियत यह है कि सुन्नी इस्लाम में यह एक रास्ता बताता है और इसे मानना बाध्यकारी नहीं है पर शिया इस्लाम में जिस ने किसी मुद्दे पर फतवा हासिल किया है उसे उस फतवे को मानना आवश्यक है या वह विशेष फतवा उस व्यक्ति पर बाध्यकारी होता है.
         आज जिस तरह से किसी मुद्दे पर किसी मुसलमान द्वारा फतवा हासिल किया जाता है और उसका समाचार पत्रों और टीवी पर जिस तरह से शोर शराबा किया जाता है उसका कोई मतलब नहीं होता है क्योंकि हर व्यक्ति धार्मिक मामलों में विशेषज्ञ नहीं होता है और उस स्थिति में अगर वह इस्लाम के अनुसार निर्देश लेना चाहता है तो यह उसका दीनी हक है ऐसे लोगों से बहुत सारे अन्य लोगों को भी सहायता मिल जाती है क्योंकि वे भी यदि उस तरह की परिस्थिति में होते हैं तो उनके पास इस तरह के फतवे से निर्णय लेने में आसानी होती है. अभी तक संभवतः आम मुसलमान और अन्य धर्मों के लोग भी फतवे के बारे में यही सोचते हैं कि इस्लाम में फतवे के तौर पर जो कुछ भी कहा गया है वह हर मुसलमान पर बाध्यकारी है और इसका कई तरह से दुष्प्रचार भी किया जाता है. इस्लाम में सही सीख क्या है आज भी इसके बारे में आम मुसलमानों और अन्य धर्मों को अधिक नहीं पता है जिससे कोई भी कहीं से भी कुछ कहकर इस्लाम पर सवालिया निशान लगाने का काम करने लगता है जबकि इसे पूरे स्वरुप में देखने की आवश्यकता होती है.
           किसी मसले पर जहाँ पर किसी मुसलमान की समझ में कुछ नहीं आता है कि कहीं उसके द्वारा किया जाने वाला कोई काम इस्लामिक मूल्यों पर ग़लत न हो तो वह मुफ्ती और उलेमा की राय मांगने के लिए स्वतंत्र है पर साथ ही यह भी देखना चाहिए कि उस व्यक्ति की परिस्थितियां क्या थीं और किस तरह से उसने काम किया है ? हर स्थान पर परिस्थितयां भिन्न हो सकती है और किसी एक फतवे को सभी पर बाध्यकारी नहीं बनाया जा सकता है तभी इस्लाम में फतवे को बाध्यकारी बनाने की जगह स्वैच्छिक बनाया गया है. यह इस्लाम की राह पर चलने का सही रास्ता तो बताता ही है साथ ही यह भी स्पष्ट करता है कि इस्लाम के अनुयायी किस तरह से अपने जीवन को सही ढंग से जी पाएं. आज जिस तरह से पत्रकारिता की जाती है उसमें भी किसी भी फतवे को लेकर बहुत कुछ कहा जाता है जबकि उसके पूरे सन्दर्भ का ज़िक्र भी नहीं किया जाता है. किसी भी फतवे को लेकर जब भी कुछ छपता है तो लोग उसके असली पहलू को समझने के स्थान पर अपने ढंग से उसकी भी व्याख्या करना शुरू कर देते हैं. अब सही समय है कि इस्लामिक शिक्षा केन्द्रों को केवल मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि इस्लाम के मूल्यों की सही जानकारी सभी तक पहुँचाने के लिए सही दिशा में प्रयास करने चाहिए जिससे इस तरह के किसी फतवे को लेकर अनावश्यक रूप से सनसनी फ़ैलाने का काम न किया जा सके.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

2 comments:

  1. प्रिय महोदय,

    पीएसआई समाचार सेवा हिंदी उर्दू और मराठी भाषा में काम करती है। हम लघु समाचार पत्रों को प्रतिदिन फीचर व समाचार भेजते हैं। यदि आप आज्ञा दें तो आपके नाम के साथ आपके छपे हुए लेख हम जारी कर सकते हैं।

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    धन्यवाद

    मुद्दस्सिर खान

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