मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 3 January 2013

धार्मिक पर्व और पहनावा

                      इलाहाबाद में होने वाले कुम्भ मेले की व्यवस्था में लगे मेला प्रशासन ने एक बार फिर से अजीब सी अपील करके भारतीय दोहरी मानसिकता को प्रदर्शित किया है. प्रशासन ने आने वाले श्रद्धालुओं से यह अपील की है कि "धार्मिक पर्व को ध्यान में रखते हुए ही ड्रेस पहने" जिसने पूरे देश में महिलाओं की ड्रेस को लेकर चल रहे समर्थन और विरोध को एक बार फिर से नयी हवा दे दी है. यह सही है कि मेला क्षेत्र में पूरी व्यवस्था को सुचारू ढंग से चला पाना बहुत बड़ी चुनौती होती है फिर भी जब सुरक्षा की दृष्टि से इतने बड़े आयोजन के लिए चप्पे चप्पे पर पुलिस तैनात की जा रही है तो फिर किसी को कुछ ख़ास पहनने या न पहनने के लिए कैसे सुझाव दिए जा सकते हैं ? आज भी जिस तरह से महत्वपूर्ण कामों में लगे हुए प्रशासनिक अधिकारी केवल एडवायज़री जारी करके अपने कर्तव्य को पूरा मान लिया करते हैं उससे किसी भी समस्या को सुलझाया नहीं जा सकता है. यह भी सही है कि पूरे मेला क्षेत्र में भीड़ का लाभ उठा कर अराजक तत्व भी घुस आते हैं जो किसी भी तरह से अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आते है तो उनसे निपटने के लिए जिन उपायों को लागू करने की बातें की जाती हैं यदि उन पर ही अमल किया जाये तो पूरा आयोजन आसानी से निपट सकता है.
              धार्मिक भावनाओं के साथ महाकुम्भ में आने वाले श्रद्धालुओं को भी यह पता है कि कहीं पर कैसा व्यवहार किया जाना चाहिए पर प्रशासन केवल अपनी बात को इस तरह से कहकर अपनी जिम्मेदारियों से ही पीछा छुड़ाना चाहता है कि यदि कहीं कोई घटना सामने आती है तो उसकी तरफ़ से यह कहा जा सके कि हमने तो इस बारे में अपील की थी पर लोग सुनते ही नहीं है. महाकुम्भ हमेशा से ही विदेशी सैलानियों के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहा है और उस स्थिति में उनके पहनावे आदि को लेकर क्या किया जा सकता है ? हालांकि जिन देश से ये पर्यटक भारत आते हैं वहां की सरकारें खुद ही उन्हें भारत में अपनी ड्रेस पर ध्यान देने के लिए पहले से ही सूचित कर देते हैं फिर भी कुछ लोग अपनी प्रवृत्ति के कारण कुछ ऐसा करते हैं जिससे वे सभी की नज़रों में आ जाते हैं ऐसे में जब स्थान स्थान पर पुलिस की व्यवस्था है तो उसमें कुछ ऐसी व्यवस्था भी होनी चाहिए जिससे इस तरह से मेले के अनुरूप ड्रेस न पहनने वालें लोगों को इसके बारे में सूचित किया जाये और उन्हें शालीनता और गरिमा को बनाये रखने के लिए प्रेरित किया जाये.
              पूरे मेला क्षेत्र में पुलिस और अन्य प्रशासनिक कार्यों में लगे हुए हर व्यक्ति की यह ज़िम्मेदारी होनी चाहिए कि वह कहीं से भी कुछ भी ऐसा देखें जिससे किसी भी स्तर पर कोई अभद्रता होने की सम्भावना हो तो उसे वहीं पर रोकने की कोशिश करें जिससे महिलाओं के प्रति किसी भी तरह के अपराध की मंशा से आये हुए असामाजिक तत्वों को यह महसूस हो जाये कि मेला क्षेत्र में पूरी सख्ती है और हर किसी पर नज़र रखने का काम किया जा रहा है. ड्यूटी पर लगे हुए पुलिस कर्मियों को इस बारे में विशेष रूप से तैयार किया जाना चहिये जिससे वे समय रहते ही इस तरह की किसी भी घटना को समय से पहले ही रोकने का काम कर सकें ? केवल किसी तरह की अपील करके इस काम को करवाने के स्थान पर पूरी तरह से इस बारे में भी चौकन्ने रहकर ऐसी घटनाओं को पूरी तरह से रोका जा सकता है. वैसे भी देश भर से जो श्रद्धालु इस माह आयोजन में भाग लेने आते हैं वे पहले से ही धार्मिक भावना और श्रद्धा से भरे होते हैं इसलिए उनसे किसी तरह के अभद्र व्यवहार की आशा भी नहीं की जाती है फिर भी कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो केवल मौज मस्ती के लिए पर्यटक बनकर यह आयोजन देखने आते हैं तो उनके लिए केवल सख्ती ही काम कर सकती है क्योंकि वे किसी भी अपील को मानने में अपने अधिकारों का हनन होता देखते हैं.    
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