मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 14 February 2013

यासीन मालिक जानवर या इंसान ?

                              जेकेएलऍफ़ के अध्यक्ष यासीन मालिक द्वारा अफज़ल गुरु को फांसी दिए जाने के बाद जिस तरह से इस्लामाबाद में २४ घंटे की भूख हड़ताल पर बैठने के बाद से भारत में उनके खिलाफ कार्यवाही करने की मांग तेज़ होती जा रही है उससे यही लगता है कि यासीन द्वारा इस तरह के दिखावे से केवल अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की भारत-पाक संबंधों और कश्मीर पर एक बार फिर से नज़रें टिक सकती हैं. दुनिया भर में मानवाधिकार के तथाकथित पुरोधा आज भारत में आतंकियों को फांसी देने की व्यवस्था को समाप्त करने की मांग कर रहे हैं पर वे यह भूल जाते हैं कि कसब और अफज़ल जैसे लोगों ने कितने निर्दोषों की जानें ली थीं और उसके पीछे भी केवल उनकी नफ़रत भरी मानसिकता ही काम कर रही थी. क्या यासीन इतने भोले हैं कि उन्हें यह भी नहीं पता है कि भारत के सबसे वांछित आतंकी के साथ मंच साझा करने के बाद उनके प्रति देश में क्या रवैया अपनाया जा सकता है या फिर वे कश्मीर में आज केवल दिखाई देने वाली शांति को भंग करने के बारे में एक बार फिर से कुछ सोच चुके हैं ? यासीन खुद भी एक आतंकी रह चुके हैं इसलिए यह कह पाना मुश्किल ही है कि वे आज जिस तरह से अपने को गाँधी और अहिंसा का पुजारी बताते हैं यह उनकी सोच में वास्तविक बदलाव है या दिखावा फिर वे यही सीख आतंकियों को क्यों नहीं देते हैं ? 
                                                  १९४७ से आज तक कश्मीर में जो कुछ भी हुआ है उसके पीछे इन आतंकियों की सोच ही ज़िम्मेदार है क्योंकि आज अगर कश्मीर में जल चुकने के बाद धुवां उठती हुई शांति है तो वह भी इन्हीं आतंकियों की देन है क्या कोई कश्मीरी यह बताने की ज़हमत उठाएगा कि एक समय कश्मीर को देश का सबसे शांत इलाका माना जाता था आज अगर वह ज़न्नत से दोज़ख बन गया है तो उसके लिए कौन ज़िम्मेदार है ? यासीन कहते हैं कि वे इंसान हैं जानवर नहीं पर जब आम कश्मीरियों को आतंकियों द्वारा डराया धमकाया जा रहा था तो उस समय किसी ने भी यह नहीं सोचा था कि भारत द्वारा सुरक्षा बलों को भेजे जाने के बाद स्थितियां इस तरह से सामान्य हो जायेंगीं . यासीन में अगर इन्सान होता तो कश्मीरी पंडितों का जिस तरह से घाटी से पूरी तरह से सफाया किया गया तो वह ज़रूर कुछ बोलता और जिस तरह से उन्हें घरों से बेघर किया गया क्या वह इंसानों का काम था ? क्या कश्मीर में इंसानियत की कोई नयी परिभाषा बन गयी है जिसमें निर्दोषों को भागने और उनको मारने पर किसी की जुबां नहीं खुलती पर जब आतंकी हमले में सजा पाए हुए आतंकियों को उनके कामों की सजा दी जाती है तो इंसानियत जाग उठती है ?
                                               कश्मीर को इस तरह की सोच ने पहले ही बहुत नुकसान पहुंचा दिया है आज वह कश्मीर रह ही नहीं गया है जिसके लिए वह कभी मशहूर हुआ करता था. दुनिया में सबसे अधिक पर्यटकों को लुभाने की क्षमता रखने वाले हमारे कश्मीर में आज जो कुछ भी हो रहा है वह किसने शुरू किया था ? आज भी अगर यासीन और उनके जैसे कश्मीरी नेता सही दिशा में नहीं सोचना चाहते हैं तो यह कश्मीर के लिए भी बहुत ख़तरनाक साबित होने वाला है क्योंकि जिस तरह से आज कश्मीर में सुरक्षा बलों ने अपने तेवर कड़े कर लिए हैं उसके बाद आतंकियों के लिए कुछ भी करना ज़ोखिम भरा ही है. अच्छा होता कि कश्मीरी नेता इस झूठी शान की लड़ाई को ख़त्म कर कश्मीर में विकास के नए आयामों पर मिलकर विचार करते वहां पर जो भी संसाधन उपलब्ध हैं उनका कश्मीरी लोगों के हितों में बेहतर उपयोग करने के बारे में कोई कोशिश करते जिससे आज कश्मीर की यह हालत न होती और दुनिया को खुद ही पता चल जाता कि यासीन मालिक इंसान है कि जानवर ?     
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

1 comment:

  1. हमारी सरकारों के ढुलमुल रवैये ने हि पाकिस्तान और उसकी शाह पर काम करने वाले आतंकवादियों के हौसले इस कदर बुलंद कर दिए है कि आज वे खुलेआम भारत के दुश्मनों से मिलने लगे हैं और धमकी दे रहें हैं कि जो करना है कीजिये !!

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