मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 4 May 2013

कैदियों पर संकट

                       पाकिस्तान की लाहौर जेल में सरबजीत सिंह की निर्मम हत्या करवाने के बाद जिस तरह से जम्मू की जेल में उम्र क़ैद की सजा काट रहे सनाउल्लाह को एक पूर्व फौजी ने बुरी तरह घायल कर दिया है उसके बाद पाकिस्तान को अब जेल में बंद अपने क़ैदियों की चिंता सता रही है जबकि उसके अधिकारियों ने एक साजिश के तहत सरबजीत पर जानलेवा हमला करवाया था तब उन्हें सरबजीत के अधिकारों की कोई परवाह नहीं थी. पहली दृष्टि में यह मामला केवल आपसी रंजिश का ही लगता है क्योंकि जिस तरह से इस प्रकरण में केवल एक ही व्यक्ति विनोद कुमार ने सनाउल्लाह पर वार किया उससे यही लगता है कि इस मामले में जेल अधिकारी संलिप्त नहीं हैं. पाक की नियति में अपने जन्म के समय से ही खोट है इसलिए उसे पूरी दुनिया में वैसा ही दिखाई देता है. भारत ने इस घटना को गंभीरता से लेते हुए इस पर तुरंत कार्यवाही करते हुए अपने तेवर दिखा दिए हैं कि उसके यहाँ इस तरह से कैदियों पर हमले को किसी भी परिस्थिति में सरकारी आश्रय नहीं दिया जा सकता है साथ ही पाकिस्तान के तीन अधिकारियों को सनाउल्लाह से मिलने के लिए अनुमति भी प्रदान कर दी है.
                       पाकिस्तान में जिस तरह से कट्टरपंथियों और सेना के प्रभाव में नयी पीढी पूरी तरह से आतंकी गतिविधियों में संलग्न होती जा रही है उससे आने वाले समय में पाकिस्तान पूरी दुनिया के लिए एक और बड़ा ख़तरा बनने वाला है तब यह भी हो सकता है कि अमेरिका अपने हितों को संरक्षित करने के लिए पाक पर खुले आम अफ़गानिस्तान की तरह हमला भी कर दे ? भारत पाक की लगती हुई सीमाओं के कारण दोनों देशों के सामान्य नागरिक भी रास्ता भटक कर एक दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश कर जाते हैं और सरबजीत की तरह ही ग़लत पहचान का शिकार हो जाते हैं इस तरह कि परिस्थिति में कुछ ऐसा अवश्य होना चाहिए कि इस तरह से पहली बार सीमा पार कर दूसरे देश में प्रवेश करने वाले लोगों की पक्की बायोमीट्रिक शिनाख्त दर्ज़ कर उन्हें बिना किसी तरह की कानूनी प्रक्रियाओं के छोड़ देने के बारे में विचार किया जाना चाहिए क्योंकि यदि वे किसी भी तरह की जासूसी आदि में शामिल हैं तो इस पहचान का उपयोग कर उन्हें कड़ी सज़ा भी दी जा सकती है इससे जहाँ निर्दोष लोगों को अनावश्यक विद्वेष की राजनीति से बचाने में मदद मिलेगी वहीं कोई सरबजीत की तरह मारा भी नहीं जा सकेगा.
                        पाकिस्तान से किसी भी तरह की मानवीय पहल की उम्मीद नहीं की जा सकती है क्योंकि वहां पर जिस तरह से धर्म के नाम पर नफ़रत फ़ैलाने की कोशिशों पर नयी पीढ़ी को चलाने की कोशिशें की जा रही हैं उनसे कुछ और बेहतर होने की आशा भी नहीं की जा सकती है. इस तरह के मामलों में अब सीमा पर रहने वाले भारतीयों और तैनात सुरक्षा बलों को और भी सचेत रहना होगा क्योंकि सीमाओं की धुंधली रेखाएं किसी को भी इस तरह की किसी पाकिस्तानी साजिश का शिकार बना सकती हैं. भारत के पास इस मामले में सीमित विकल्प ही हैं क्योंकि हम अपनी मानवीयता को मौके के अनुसार निर्धारित नहीं करते हैं हमारे लिए मानवाधिकार एक संवेदनशील मसला है जबकि पाक के लिए यह केवल एक सुविधा है जिसे वह अपने लिए तो मानता है पर दूसरों के लिए ऐसा सोचने का समय उसके पास नहीं होता या वह सोचना ही नहीं चाहता है ? अब समय आ गया है कि अंतर्राष्ट्रीय दबाव और कूटनीतिक प्रयासों के माध्यम से भारत पाकिस्तान के साथ इन क़ैदियों की सूचनाओं का नियमित आदान प्रदान करे जिससे आने वाले समय में इस तरह से निर्दोषों पर होने वाली राजनीति को तो हर हाल में बंद ही किया जा सके.        
                        
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