मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 8 June 2013

आतंक-कानून और नीतियां

                                           भारत में जिस तरह से इस्लामी चरम पंथियों ने कश्मीर के बाद पूरे देश में अपना प्रभाव बढाने की दिशा में काम करना शुरू किया है उससे आज भी देश की जनता और राजनैतिक तंत्र को कुछ एहसास नहीं हो रहा है क्योंकि आज जो कुछ बहुत छोटे स्तर पर हो रहा है कल को वह और भी बड़े स्तर पर हो सकता है और शान्ति के साथ जी रहे आम भारतीयों के लिए आने वाला समय बिना बात का ही जातीय और धार्मिक संघर्ष भी सामने ला सकता है. देश में आज भी आतंक से निपटने के लिए जिस तरह के कानूनों की आवश्यकता है उनकी भी भारी कमी है क्योंकि आतंक से लड़ने के लिए देश के राजनेताओं के पास इच्छा शक्ति की बहुत कमीहोने से वे आतंक से समग्र रूप से लड़ने के स्थान पर इससे तात्कालिक रूप से ही लड़कर अपने वोट बैंक को सुरक्षित रखना चाहते हैं जो कि देश के भविष्य के लिए बहुत ही घातक साबित हो सकता है. भारत में इस्लामी आतंक के आगे बढ़ने में कहीं न कहीं देश के नेताओं की नीतियां भी ज़िम्मेदार हैं क्योंकि जब तक समाज के सभी वर्गों को उन्नयन नहीं किया जा सकेगा इस तरह का असंतोष पनपता ही रहेगा और जब इसे धर्म के साथ जोड़ दिया जाता है तो इसका बहुत बुरा स्वरुप सामने आता है.
                                          यूपी में अखिलेश सरकार द्वारा जिस तरह से उन संदिग्ध आतंकियों के विरुद्ध मुक़दमें वापस लेने का एक अभियान चलाया गया वैसे देखा जाए तो उसमें कोई बुराई नहीं है क्योंकि देश का कोई भी कानून किसी निर्दोष को केवल शक़ के आधार पर लम्बे समय तक जेल में रखने का समर्थन नहीं करता है पर राजनैतिक कारणों या पुलिसिया ढीले रवैये के कारण केस में तेज़ी न आने देने से निर्दोषों के लिए और भी अधिक समस्या उत्पन्न हो जाती है. इस तरह के मुक़दमें वापस लेने के अति उत्साह में सपा सरकार ने मुक़दमों के गुण दोषों पर भी विचार किए बिना ही आदेश जारी करने शुरू कर दिए जिससे निर्दोषों को मुक्त करने का एक अच्छा अभियान अपनी शुरुवात में ही लटकता दिखाई देने लगा है. अच्छा होता कि इस तरह के मामलों की पहले पूरी तरह से समीक्षा की जाती और कानूनी रूप से सभी पहलुओं पर विचार किये जाने के बाद ही आगे के क़दम उठाए जाते जिससे ईमानदारी के साथ जिन लोगों को छोड़ा जा सकता था उसमें कोई राजनीति नहीं हो पाती और इस मुद्दे पर कोई सकारात्मक क़दम उठाए जाने तरफ कुछ क़दम बढ़ाए जा सकते.
                                          यह सही है कि राज्यों को अपने अनुसार किसी भी संदिग्ध के विरुद्ध मुक़दमों को वापस लेने की छूट संविधान ने दी हुई है पर जब किसी भी संदिग्ध को आतंक निरोधी गतिविधियों के तहत केन्द्रीय और राज्य के कानून के तहत निरुद्ध किया गया हो तो कानूनन केवल राज्य सरकार ही यह निर्णय नहीं ले सकती है जिससे पूरे मामले में रूकावट दिखाई देने लगी है. कहीं ऐसा तो नहीं है कि अपने को मुसलमानों का पुरोधा साबित करने के लिए ही सपा न जानबूझकर ऐसा निर्णय लिया है जिससे इसमें अनावश्यक कानूनी झमेले बढ़ें और वह मुसलमानों के सामने इस बात को कह सके कि केंद्र सरकार उनकी विरोधी है ? अच्छा होता कि पूर्ण बहुमत की स्थिति में चल रही सपा सरकार कम से कम यूपी में अपने कानूनों में आवश्यक संशोधन कर देती जिससे आने वाले समय में किसी भी संदिग्ध आतंकी को इस तरह अनिश्चित काल के लिए हिरासत में नहीं रखा जा सकता पर इस तरह के ठोस प्रयासों से वास्तव में उन मुसलमान युवकों को बड़ी राहत मिल जाती जो किसी लालच, दबाव या कानूनी दांवपेंच के कारण अनावश्यक रूप से जेल में रहने को मजबूर हैं ? सभी दलों को केवल मुसलमानों के सामने भय दिखाकर राज करने की चाहत भी कहीं न कहीं से पूरे मामले को बिगाड़ने का काम ही कर रही है.        
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