मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 9 June 2013

यूपी और हिंदी

                                  हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ के प्रचार प्रसार के लिए सपा जिस तरह से शुरू से ही प्रयासरत रही है उस परिदृश्य में यूपी में उसकी सरकार के होते हुए हाई स्कूल परीक्षा में लगभग साढ़े तीन लाख परीक्षार्थी मातृभाषा हिंदी में फेल हो गए हैं. यहाँ पर यह बात भी विचार करने योग्य है कि आख़िर प्रदेश और देश की शिक्षा व्यवस्था में ऐसी कौन सी कमी है जिसके कारण बच्चों के लिए अपनी मातृभाषा भी इतनी कठिन होती जा रही है ? प्रदेश के नियम के अनुसार हिंदी में फेल होने वाले विद्यार्थियों को पूरी तरह से फेल माना जाता है और उन्हें किसी भी तरह की छूट भी नहीं दी जाती है तो ऐसी परिस्थिति में आख़िर शिक्षा के इस स्वरुप पर कौन चिंता करेगा ? प्रदेश में जिस तरह से शिक्षा के नए नियमों और कानूनों के अनुसार अभी तक प्राथमिक शिक्षा पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है यदि उसके बाद यह परिणाम सामने आता है तो क्या इस पूरे तंत्र पर फिर से विचार करने और इसे परिवर्तित करने की आवश्ताकता नहीं है और आज यह ज़िम्मेदारी उठाने के लिए कौन आगे आने वाला है ?
                                 देश में शिक्षा का यह गिरता हुआ स्तर हमारी प्राथमिक शिक्षा और साक्षरता को एक साथ जोड़कर सर्व शिक्षा अभियान चलाने के कारण ही अधिक हो रहा है क्योंकि नए नियमों के तहत सरकार रोज़ ही असेवित क्षेत्रों में प्रथमिक विद्यालयों को खोलने का क्रम तो जारी रखे हुए है पर उसके पास इस बात की निगरानी करने का समय नहीं है कि आख़िर इन विद्यालयों में उचित संख्या में शिक्षक उपलब्ध भी है और क्या वे वहां जाकर सामान्य रूप से शिक्षण के काम को पूरा भी कर रहे हैं ? इस मामले में यदि पंचायती राज विभाग की भागीदारी और बढ़ाई जाए और प्राथमिक शिक्षा को पंचायत स्तर पर ही देखा जाए तो पूरा परिदृश्य बदला भी जा सकता है क्योंकि जब यह व्यवस्था पूरे प्रदेश में लागू हो जाएगी तो किसी भी ग्रामीण अंचल के विद्यालय में शिक्षकों की कमी का रोना नहीं रह जायेगा और शिक्षा के स्तर को निचले स्तर से ही सुधारने में सही दिशा में प्रयास किये जा सकेंगें. जब तक शिक्षा में स्थानीय भागीदारी को नहीं बढाया जायेगा तब तो इसी तरह से हम निम्नता की तरफ गिरते चले जायेंगें.
                                 आज हमारी आवश्यकता क्या है शायद सरकारें यह जान ही नहीं पा रही हैं जिस कारण से भी ऐसे क़दम उठाये जा रहे हैं सबसे पहले उन पर ही विचार किये जाने की ज़रुरत है क्योंकि जब तक सरकारें आवश्यकताओं के स्थान पर अपनी प्राथमिकताओं को जनता और समाज पर थोपती रहेंगी तब तक समाज में इसी तरह का परिणाम सामने आता रहेगा क्योंकि अभी भी जो भी सरकारी प्रयास हैं उनका कुछ इसी तरह से प्रभाव सामने आता रहता है ? आज भी सभी दल केवल देश की शिक्षा व्यवस्था पर ही उँगलियाँ उठाते रहते हैं पर उनकी तरफ़ से सरकार चलाते समय ऐसा कोई भी प्रयास नहीं किया जाता है जिससे बच्चों को उनकी आवश्यकता के अनुसार प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा मिल सके जिसका असर भी पूरे समज पर दिखाई देता है सरकार के पास मानाने के लिए हिंदी दिवस तो है पर जब हिंदी की ऐसी दुर्गति हिंदी के प्रदेश में ही हो रही है तो इसके लिए आख़िर सरकार, शिक्षा व्यवस्था, अभिभावकों या बच्चों किसको ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए क्योंकि नीतियों में कमी हो या कुछ और पर इससे सबसे अधिक प्रभावित तो केवल देश का भविष्य ही होता है. 
                         
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