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Friday, 12 July 2013

जातीय राजनैतिक सम्मलेन

                                            यूपी की राजनीति में वोट पाने के लिए जिस तरह से कुछ भी किए जाने से कभी भी परहेज़ नहीं किया जाता रहा है और बसपा ने जिस सोशल इंजीनियरिंग के माध्यम से एक बार सत्ता का भरपूर उपभोग भी किया था उसके बाद सभी राजनैतिक दलों ने उसके इस क़दम की नक़ल करते हुए जातीय सम्मेलनों पर ध्यान देना शुरू भी कर दिया था पर इसी बीच राजनैतिक दलों द्वारा किये जा रहे इस तरह के असंवैधानिक क़दमों को जिस तरह से संविधान का सहारा लेकर इलाहबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच द्वारा रुकवाया गया है उससे यही लगता है कि राजनेता अपने हितों के लिए किसी भी समय किसी भी कानून में कमियां खोजकर उनका इस्तेमाल अपने अनुसार करने की महारत रखते हैं. यूपी में जिस तरह से आज भी जातीय विभाजन बहुत बड़े स्तर पर राजनैतिक शक्ति बना हुआ है उस परिस्थिति में सभी राजनैतिक दल इस नाटक को बसपा की देखा देखी खेलने को मजबूर हैं क्योंकि बसपा के कैडर बेस पार्टी होने के कारण जहाँ उसके लिए इस तरह के आयोजन करना बहुत आसान होता है वहीं अन्य पार्टियों को इसके लिए बहुत शक्ति लगानी पड़ती है और लोकसभा चुनावों से पहले बसपा की इन तैयारियों ने अन्य दलों के लिए समस्या खड़ी कर दी थी.
                                             यह सही है कि संविधान लिंग, जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र, सम्प्रदाय और भाषा के आधार पर किसी भी तरह से वोट मांगने से पूरी व्यवस्था को रोकता है पर जिस तरह से आज के नेताओं में संविधान की धज्जियाँ उड़ाने वाले काम करने में सुखद अनुभूति होती है उस स्थिति में इनसे किसी भी संवैधानिक और विधि द्वारा स्थापित परंपरा के निर्वहन की बात करने की आशा रखना भी बे-ईमानी है ? वोट के लालच में ही नेता समाज का समग्र विकास नहीं होने देते हैं क्योंकि यदि समाज के सभी वर्ग शिक्षित होकर आगे बढ़ना सीख जाएंगें तो इनकी काली करतूतों और समाज को बांटकर राज करने की नीतियों को समझने की शक्ति भी इनमें आ ही जाएगी जिससे सबसे बड़ा नुकसान इन नेताओं का ही होने वाला है. देश में आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी दलितों, पिछड़े और अल्पसंख्यकों की स्थिति में कुछ सुधार नहीं दिखाई देता है इसका क्या कारण है आज तक इस पर कभी भी किसी ने विश्लेषण करना उचित नहीं समझा क्योंकि इस विश्लेषण और इनके लिए सही योजनाएं बनाने से वोट नहीं मिल सकते हैं और लालच का झुनझुना थमाकर इनसे वोट मांगने वाले नेताओं के लिए वह स्थिति सुखद नहीं हो सकती है.
                                          देश में जो भी वंचित या पिछड़े हैं उनके लिए आख़िर सभी राजनैतिक दल मिलकर काम क्यों नहीं करना चाहते हैं जबकि सभी इस बात से सैद्धांतिक रूप से सहमत हैं कि सभी का विकास होना ही चाहिए पर आज भी उनके प्रयास कुछ ऐसे ही लगते जैसे वे इस समस्या के तात्कालिक निपटारे के लिए ही प्रयासरत रहते हैं. अच्छा हो कि कोर्ट इन विभिन्न तरह के कथित वंचितों के बारे में भी ऐसा ही आदेश पारित कर दे जिससे नेताओं के लिए इस नाम पर वोटों का जुगाड़ करना और भी मुश्किल हो जाए क्योंकि जब तक इस दिशा में ठोस काम नहीं किया जायेगा तब तक स्थितियों को सुधारा नहीं जा सकता है. जाति और धर्म आधारित पिछड़ेपन को ढूँढने के स्थान पर अब सभी दलों को केवल वास्तविक पिछड़ों पर ही ध्यान देना चाहिए भले ही वे किसी भी जाति धर्म के हों क्योंकि जब तक समाज में समग्र विकास की नीतियों को लागू नहीं किया जाएगा तब तक इसका विकास संभव नहीं है और आज जिस तरह से जातीय सम्मेलनों के माध्यम से समाज को बांटने की साजिश चलायी जा रही है उससे निपटने के लिए भी कोर्ट द्वारा कुछ आदेश आवश्यक है क्योंकि नेता इसका सीधा लाभ ले रहे हैं और वे किसी भी परिस्थिति में इस समस्या को पूरी तरह से ख़त्म नहीं करना चाहते हैं यह भी स्पष्ट हो चुका है.              
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