मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 14 September 2013

महिलाओं के प्रति अपराध

                            दिल्ली की फ़ास्ट ट्रैक अदालत ने जिस तरह से निर्भया मामले में सुनवाई करते हुए ६ में से ४ आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई है संभवतः वह अपने तरह का दुर्लभ केस ही है क्योंकि आज भी देश भर में महिलाओं के खिलाफ इस जघन्यतम अपराध करने वाले आरोपियों के खिलाफ कुछ कठोर क़दम नहीं उठाने जाने से ही हर तरफ इस तरह के अपराधों की गूँज सुनाई देती है. दिल्ली मामले में आज भी जिस तरह से फैसला आया है उससे यही लगता है कि आज भी देश में रेप करने के आरोपियों लिए जो प्रावधान हैं उनमें कुछ कमी अवश्य ही है क्योंकि इस मामले में कानून आरोपियों को अधिकतम केवल १० वर्षों की सजा ही दे सकता है पर इस मामले में फांसी की सज़ा रेप के कारण नहीं बल्कि पीडिता की हत्या के आरोप में दी गयी है ? आज भी महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों के प्रति समाज में वह संवेदनशीलता नहीं दिखाई देती है जिसकी आधुनिकता का दम भरने वाला समाज दुहाई देता नहीं थकता है.
                            आज जब मुज़फ्फरनगर सहित पश्चिमी उ०प्र० में दंगे का खौफ देखा जा रहा है तो उसके कारण पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक पूरा समाज और सरकार महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे तब तक किसी भी तरह से हम महिलाओं को सुरक्षित कर पाने में सफल नहीं हो सकेंगें ? दिल्ली में इस घटना ने जहाँ पूरे देश को हिला दिया था वहीं कवाल की घटना को केवल जातीय वैमनस्यता और दंगा न जाने क्या क्या कहा जा रहा है आज जो लोग खुलकर इस पर रिपोर्टिंग भी कर रहे हैं क्या उन्होंने कभी इन क्षेत्रों में विद्यालय जाने वाली लड़कियों की परिस्थितियों पर नज़र डालने की कोशिश भी की है क्योंकि यदि समाज के हर वर्ग ने महिलाओं के प्रति अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया होता तो संभवतः इतनी बड़ी समस्या से निजात पायी जा सकती थी ? क्या कारण है कि समाज के एक वर्ग के लोग अपने लड़कों को दूसरे वर्गों की महिलाओं और लड़कियों के साथ की जाने वाली बदतमीजी को बर्दाश्त या अनदेखा करते रहते हैं और समस्या को इस हद तक बिगड़ने देते हैं ?
                             यदि गौर किया जाये तो ये दोनों ही समस्याएं सामजिक रूप से हैं और इनका पुलिस प्रशासन से कुछ लेना देना नहीं है पर यदि समय पर पुलिस द्वारा कुछ कड़े क़दम उठा लिए जाएँ तो उनके बाद उत्पन्न होने वाले इस तरह के माहौल को रोका तो जा ही सकता है पर स्थानीय कारकों और राजनैतिक मजबूरियों के चलते जिस तरह से पुलिस को काम ही नहीं करने दिया जाता है तो उस परिस्थिति में सद्भाव बिगाने और असुरक्षा को बढ़ने से कैसे रोका जा सकता है ? एक रिपोर्ट के अनुसार उ०प्र0 में आज निचले स्तर के ८० % पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की तैनाती स्थानीय नेताओं के कहने के अनुसार ही की गयी है तो उस स्थिति में सरकार की निचले स्तर की इस इकाई से आखिर किस तरह से निष्पक्ष कार्यवाही की आशा की जा सकती है ? अब समय आ गया है कि समाज हर मामले में अपनी ज़िम्मेदारी को समझने का प्रयास करे क्योंकि यह मेरे साथ नहीं हो रहा तो आँखें मूंदे रखने से कितना बड़ा बवाल कवाल में हो गया यह सभी ने देखा है जो आज अपने दोषों को पूछ रहे हैं क्या वे एक लड़की पर किये जा रहे आपत्तिजनक कमेंट्स से उसे पहुँचने वाली पीड़ा का एहसास करना भी चाहते हैं या फिर वे निष्पक्षता के स्थान पर ऐसी परिस्थितियों में केवल अपने जाति और धर्म के साथ ही खड़े होना चाहते हैं ?  
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