मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 30 October 2013

मनमोहन - मोदी और मीडिया

                                                      लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल के संग्रहालय के उद्घाटन के अवसर पर जिस तरह से पीएम मनमोहन सिंह और नरेंद्र भाई मोदी द्वारा मांचा साझा करने को मीडिया द्वारा ऐसे प्रचारित किया गया जैसे पता नहीं कितने बड़े दुश्मन एक साथ दिखाई देने वाले हों और उसके बाद जैसे सब कुछ एकदम से ही बदल जाने वाला हो. आज जब मीडिया की समाज और राजनीति में सक्रिय और प्रभावी भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है तो उसी मीडिया द्वारा पहले स्वतंत्रता दिवस पर लालकिले से पीएम के भाषण और मोदी के भाषण की तुलना करके जिस तरह से अपनी मनः स्थिति को दर्शाया गया था उसके बाद उससे कुछ अच्छे की आशा तो नहीं की जा सकती थी. देश के पीएम के किसी राज्य में महत्वपूर्ण कार्यक्रम में जाने पर राज्य के सीएम स्वयं उपस्थित होकर उनका सम्मान करते हैं और अगर मोदी द्वारा भी यही किया जा रहा था तो इसे एक दुश्मनों के मंच साझा करने जैसी घटना के रूप में क्यों प्रदर्शित किया जा रहा था ?
                                                       कांग्रेस पर देश में नेहरू गांधी परिवार के नेताओं को लेकर राजनीति लगाने का आरोप लगाने वाली भाजपा के मोदी ने जिस तरह से अपने सम्बोधन में पटेल के गुणों की चर्चा करने के स्थान पर यह रोना रोया कि यदि वह देश के पहले पीएम होते तो देश का हाल कुछ और ही होता उससे यही पता चलता है कि वे किसी भी अवसर पर अपने को राजनीति करने से दूर नहीं रखना चाहते हैं यह कोई पूरी तरह से राजनैतिक कार्यक्रम नहीं था यदि वे केवल पटेल की बातों और उनके कार्यो को ही याद करने तक सीमित रहते तो शायद वह उनके आक्रामक स्वभाव के विपरीत ही होता और मनमोहन के साथ साझा किये गए मंच के बारे में भाजपा के पास कुछ मसाला न बचता इसलिए ही उन्होंने एक रणनीति के तहत ही इस तरह से माहौल को दूसरी तरफ ले जाने की कोशिश की ? आज़ादी के समय देश के नेताओं ने जो भी किया उसके बारे में आज बातें करना बहुत आसान है पर उस विषम परिस्थिति में नेहरू और पटेल ने मत विभिन्नता होने के बाद भी अपने कार्यों से देश को एक करने में पूरी ताकत लगा ही दी थी उसकी कोई तुलना आज के समय में नहीं की जा सकती है.
                                                   पूरे सम्बोधन में मोदी द्वारा दिशा बदलने के बाद मनमोहन ने जिस तरह से पटेल की विरासत और कांग्रेस के इतिहास पर गर्वान्वित होने की बात पूरी दृढ़ता के साथ मंच से कही और पटेल के कार्यों और उनके कांग्रेसी होने पर अपनी ख़ुशी का प्रदर्शन किया उनके वैसे रुख की कल्पना तो सम्भवतः कांग्रेस ने भी नहीं की थी मोदी और भाजपा ने सोचा होगा कि वे सरदार पटेल की विरासत को मनमोहन के मौन के बीच ही हथिया लेने की पूरी कोशिश करेंगें और उसमें उन्हें सफलता मिल जायेगी पर मनमोहन ने जिस तरह से पटेल के सार्वजनिक जीवन में सामाजिक सद्भाव बढ़ाने की कोशिशों का ज़िक्र किया उसके बाद मोदी को उनकी बातों का जवाब मिल ही गया. देश में हर पार्टी अपने नेताओं के नाम पर योजनाओं और अन्य विकास परक घोषणाओं का नाम जोड़ती रहती हैं फिर कांग्रेस ने भी वही किया जो समय मिलने पर देश की अन्य पार्टियों ने किया है. पटेल देश के नेता थे और उन्होंने उस समय एक गृह मंत्री होने के अपने कर्तव्य को पूरी तरह से निभाया जिसके बाद ही उन्हें लौह पुरुष कहा जाने लगा अगर पटेल होते तो क्या होता और क्या न होता सोचना आज के समय में कुछ नहीं दे सकता है क्योंकि यदि भारत आज भी सोने की चिड़िया ही होता तो इस बात का क्या अब अफ़सोस किया जा सकता है ?          
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