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गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

जम्मू कश्मीर पुलिस की अनुकरणीय पहल

                                                     सुप्रीम कोर्ट के अवैध लाल और नीली बत्तियों के इस्तेमाल सम्बन्धी निर्देश और राज्य सरकारों से इस सम्बन्ध में एक महीने में अपनी रिपोर्ट देने के आदेश के अगले ही दिन शाम को जम्मू कश्मीर पुलिस प्रमुख अशोक प्रसाद ने स्वयं अपनी ही गाड़ी से लाल बत्ती उतरवा कर एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर दिया है कि उसके बाद अन्य राज्यों की सरकारों और पुलिस के लिए इसकी अनदेखी करना और भी मुश्किल साबित होने वाला है. अभी जब कोर्ट का यह निर्देश ही है और इस मसले पर उसकी तरफ से स्पस्टीकरण के साथ ही रिपोर्ट भी मांगी गयी हैं तो उस परिप्रेक्ष्य में प्रसाद का यह निर्णय वास्तव में अच्छी सोच को ही दर्शाता है. इस मामले में किसी न किसी स्तर पर पहल किये जाने की आवश्यकता तो थी ही पर बिना दबाव के स्वेच्छा से इसे लागू करने के उदाहरण देश में बहुत कम ही दिखायी देते है प्रसाद ने अपनी गाड़ी से इसे हटवाने के साथ ही पूरे राज्य में पुलिस अधिकारियों के वाहनों से इसे हटवाने का जो आदेश जारी किया है वह आतंक प्रभावित इस राज्य में इन बत्तियों के दुरूपयोग को रोकने के लिए बहुत अच्छा साबित हो सकता है.
                                                      जम्मू कश्मीर पुलिस के आम लोगों के साथ कड़ाई से पेश आने को तो मीडिया ऐसे प्रस्तुत करता है जैसे उसने वहाँ पर लोगों का जीना ही दूभर कर रखा है पर उसके इस महत्वपूर्ण और परिवर्तनकारी कदम को देश कितने अख़बारों और टीवी चैनलों ने खबर लायक समझा यह उनकी सोच को ही दिखाता है क्योंकि शायद पूरे देश के मीडिया से जुड़े लोगों को यही लगता है कि इस राज्य से केवल आतंक की ख़बरें ही आ सकती है और जिस तरह से वहाँ की रचनात्मक और अन्य बड़ी ख़बरों की अनदेखी की जाती है वह क्या देश के पत्रकारों के किसी पूर्वाग्रह को ही नहीं दर्शाती है ? यहाँ पर सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि जब सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुपालन में इतना बड़ा कदम उठाया जा रहा हो तो उसके बारे में छोटी खबर भी चलाना मीडिया को उचित नहीं लगता है क्योंकि वह तो सम्भवतः दिल्ली में सरकार बनाने में ही चल रही कोशिशों को सबसे बड़ी खबर मानता है और उससे आगे उसे कुछ भी दिखायी नहीं देता है कुमार विश्वास राहुल के खिलाफ लड़ेंगें यह खबर मीडिया को बड़ी लगती है पर एक स्वेच्छा से कानून का अनुपालन करने वाली खबर में उसे मसाला कम ही दिखायी देता है ?
                                                       वैसे भी दिल्ली और नोएडा में स्थित मीडिया के लिए अभी कुछ दिनों तक आप, झाड़ू और केजरीवाल से बाहर निकल पाना मुश्किल ही है क्योंकि शायद दिल्ली में सभी उसे ही देखना चाहते हैं दिल्ली के लोगों को भी बाक़ी देश की तरह इन लाल और नीली बत्ती धारियों से बहुत बड़ी दिक्कत है पर कोई क्यों नहीं मीडिया के इस तरह के अपनी मर्ज़ी के अनुसार ख़बरों को छपने और दिखाने का विरोध नहीं करता है ? देश में दिल्ली से परिवर्तन शुरू हुआ है पर क्या राजनैतिक परिवर्तन और विजय रैली से ही देश आगे बढ़ सकता है क्या मीडिया की यह ज़िम्मेदारी नहीं बनती है कि वह इस तरह की रचनात्मक बातों को आगे बढ़ाकर यह प्रदर्शित करने की कोशिश भी करे कि देश की पुलिस उतनी ख़राब भी नहीं है जितनी ख़राब मीडिया और जनता उसे मानती है ? यहाँ एक बात उन लोगों के मुंह पर भी तमाचा है जो धारा ३७० के माध्यम भारतीय सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन को जम्मू कश्मीर में नहीं करने को बड़े ज़ोर शोर से सोशल मीडिया पर प्रचारित कर रहे हैं क्योंकि यह जम्मू और कश्मीर ही है जिसमें सुप्रीम कोर्ट की मंशा को समझते हुए उसके मान को बढ़ाते हुए बिना कुछ सोचे समझे ही इस तरह का आदेश जारी कर दिया है.....    
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