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Saturday, 7 December 2013

खाद्य सुरक्षा और डब्ल्यूटीओ

                                        डब्ल्यूटीओ में काफी समय से लंबित और विचाराधीन खाद्य सब्सिडी के मसले पर भारत के कड़े और दृढ़ प्रयासों से जहाँ विश्व भर के विकासशील देशों को अपने नागरिकों को पहले की तरह ही खाद्य सब्सिडी देना अब आसान रहने वाला है क्योंकि विकसित देश अभी तक इस बात पर अधिक ज़ोर दे रहे थे कि इन विकासशील देशों के पास सब्सिडी देने में कुल खरीद का १० % अधिकार ही होना चाहिए और उससे अधिक होने पर जुर्माना भी देना पड़ सकता था या फिर कड़े प्रतिबंधों का सामना भी सम्बंधित देश को करना पड़ सकता था. यह सही है कि विकसित देश अभी तक उन नीतियों को डब्ल्यूटीओ के माध्यम से लागू करवाने के लिए ज़ोर देते रहते हैं जिससे भविष्य में उनके व्यापार पर असर न पड़े और किसी भी तरह के अनाज संकट के न होने के बाद भी वे विकसशील देशों पर अपनी शर्तें लाद सकें जिसका शुरू से ही भारत द्वारा कड़ा विरोध किया जा रहा था और अब यह स्पष्ट हो चुका है कि भारत की बात पूर्णतः मानने पर सहमति हो चुकी है और केवल इसकी औपचारिक घोषणा ही बची हुई है.
                                        भारत के लिए यह जीत संकेतिक तौर पर भले ही हो पर यह इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि चीन और ब्राज़ील ने विकासशील होने के बाद भी इस तरह की नीति और नियम के भारतीय विरोध का समर्थन नहीं किया था और भारत ने खुद अकेले ही अपने दम पर पूरी विश्व बिरादरी से भारतीय लोगों समेत अन्य देशों के लिए खाद्य सुरक्षा में अनावश्यक दखल देने वाले इस उपबंध को समाप्त करवाने में सफलता पायी है. अभी तक जिस तरह से भारतीय पीएम मनमोहन सिंह को देश के अंदर लोग कमज़ोर कहकर सम्बोधित करने से नहीं चूकते हैं उनकी वैश्विक बिरादरी में क्या हैसियत है यह उन्होंने दिखा दिया है क्योंकि आर्थिक सुधारों के बीच एक बड़े अर्थशास्त्री का इस तरह से जन सामान्य से जुड़े मुद्दे को दुनिया से मनवा लेना अपने आप में कहीं से भी कम नहीं है. देश को आज भी खेती पर निर्भर अपनी बहुत बड़ी आबादी के लिए इस तरह का खाद्य सुरक्षा कवच चाहिए था जो सैद्धांतिक तौर पर उसे मिल चुका है और अब केवल इसका अनुमोदन ही बाकी है इससे जहाँ सरकार के हाथ कोई भी निर्णय करने के लिए खुले रहने वाले हैं वहीं वह आवश्यकता पड़ने पर नीतियां संशोधित करने को स्वतंत्र भी हो गयी है.  .
                                      यह सही है कि देश में हर तरह की सब्सिडी का बहुत बड़े स्तर पर दुरूपयोग करने को नेता, अधिकारी और जनता अपना कर्तव्य मानते हैं जिससे इसका स्वरुप बहुत बड़ा दिखायी देता है विश्व मंच पर अपनी बात को मनवाने के बाद अब देश में भी नेताओं को मिलकर यह सोचना चाहिए कि आने वाले समय में खाद्य सब्सिडी के साथ हर तरह की सब्सिडी में मूलभूत सुधार किये जाएँ जिससे सरकार पर अनावश्यक बोझ न पड़े और ज़रूरतमंद लोगों तक इस सब्सिडी को पहुँचाया भी जा सके. देश में वर्तमान ढांचे में अब सुधार किया जाना सम्भव नहीं है इसलिए अब आने वाले समय में इसको पूरी तरह से बदल कर आज की आवश्यकताओं के अनुसार ढालने की बहुत ज़रुरत है जिससे आने वाले समय में भारत को इस तरह के कानूनों के लिए सम्पूर्ण विश्व का विरोध न करना पड़े और हम अपने खाद्यान्न का बेहतर प्रबंधन कर पाने में सफल हो सकें. इस मामले में सबसे बड़ी समस्या राजनैतिक इच्छाशक्ति की ही है क्योंकि ग़लत तरीके से ग़लत हाथों में जाने वाली सब्सिडी का सबसे बड़ा लाभ इन राजनैतिक तंत्र से जुड़े हुए वर्ग को ही मिलता है और सम्भवतः वे इसे सुधारने के लिए कोई प्रयास कर अपने समर्थकों को नाराज़ नहीं करना चाहते हैं.

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