मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 20 January 2014

मोदी की नज़र से देश

                                           दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में भाजपा की राष्ट्रीय परिषद् की बैठक में पीम पद के प्रत्याशी और गुजरात के सीएम नरेंद्र मोदी ने जिस तरह से देश के विकास के लिए अपनी सोच और योजनाओं के बारे में वक्तव्य दिया वह देश की राजनीति में अपने आप भाजपा के अनुसार सही कदम हो सकता है पर अभी तक इस तरह से चुनावी घोषणापत्र सरीखी बातें देश में केवल चुनावी माहौल में ही की जाती हैं. भारतीय राजनीति की उस स्थापित परंपरा से अलग हटते हुए मोदी ने जिस तरह से भाजपा और देश के सामने अपने एजेंडे को रखा वह एक सकारात्मक परिवर्तन भी कहा जा सकता है और साथ ही परम्पराओं से हटकर एक नयी शुरुवात करने का क्रम भी हो सकता है. अच्छी बात तो यह है कि इस बैठक के सम्बोधन में मोदी ने देश के विकास की अपनी व्याख्या को भी महत्व दिया क्योंकि जिस तरह से मोदी को विकास पुरुष बताकर उन्हें पहले चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष और बाद में पीएम पद का प्रत्याशी बताया गया था उसके बाद से उनकी राजनीति भी देश की घटिया राजनीति में ही उलझी हुई दिखायी दे रही थी वह निश्चित तौर पर चिंता का विषय थी क्योंकि विकास के मुद्दे से हटकर बातें होना देश के लिए कभी भी अच्छा नहीं हो सकता है.
                                          मोदी के राष्ट्रीय परिदृश्य में भाजपा द्वारा आगे लाये जाने के बाद ही यह एक बार लगने लगा था कि इस बार के चुनाव कुछ अलग तरीके के होंगें और आने वाले समय में होने वाले चुनावों को बेहतर राजनैतिक कौशल और सही दिशा नीति के साथ चलाया जाना सम्भव हो सकेगा. अब भी अगर देश की दोनों बड़ी राजनैतिक पार्टियां इस बात पर ही देश का ध्यान आकृष्ट करने की तरफ बढ़ जाएँ तो यह देश के लिए ही बहुत अच्छा होगा. भारत की सबसे बड़ी समस्या यही है कि देश के एक होने के बाद भी इन दोनों दलों में इस बात पर समरूपता नहीं आ पायी है कि आखिर देश का विकास कैसे हो सकता है ? दोनों के अपने अपने पूर्वाग्रह हैं और दोनों ही उनमें उलझकर ही काम करना चाहते हैं जिससे कई बार दोनों के अच्छे सुझाव और सपने कहीं से भी देश के काम नहीं आ पाते हैं ? देश के समग्र विकास के लिए राजनीति की उबाऊ प्रक्रिया के साथ थोडा बहुत हास परिहास तो चलता ही रहता है पर उसे भी व्यक्तिगत आक्षेपों के स्तर तक नहीं ले जाया जाना चाहिए हर नेता का अपना भी एक व्यक्तिगत जीवन होता है और उसमें अनावश्यक घुसने से कुछ तालियां तो बटोरी जा सकती है पर देश का भला नहीं किया जा सकता है आज यह बात दोनों दलों के नेताओं को सोचनी ही चाहिए.
                                         मोदी का विकास परक मॉडल देखने सुनने में अच्छा लग रहा है पर वे उसके क्रियान्वयन से पहले अटल सरकार और उससे पहले की मज़बूत आर्थिक परिदृश्य को वे अनदेखा कर गए जिसमें आयी गिरावट के कारण आज उस परियोजना के साथ अन्य परियोजनाओं का भी बहुत बुरा हाल हुआ पड़ा है. जिन राष्ट्रीय महत्व की बातों पर कॉंग्रेस और भाजपा की नीतियां समान हैं उन पर संसद में गतिरोध उत्पन्न कर भाजपा ने देश के साथ भाजपा के सपनों को भी रोक दिया है अच्छा होता कि वे उस पर भी कुछ कह देते क्योंकि गलतियों को मान लेने और बेहतर आर्थिक परिदृश्य बनाये रखने के लिए कोई जादू की छड़ी काम नहीं करने वाली है और यह बात जितनी भाजपा उतनी हो कॉंग्रेस पर भी लागू होती है. अटल सरकार ने जितना धन वित्त मंत्री के रूप में मनमोहन की सरकारी क्षेत्र की कम्पनियों के विनिवेश की नीतियों से पाया था क्या मोदी अब उसके आधे का भी जुगाड़ कर सकेंगे ? लोक लुभावन परियोजनाएं घोषित करना अलग बात है और उन पर अमल कर पाना बिलकुल अलग बात है अब देश को सभी राजनैतिक दलों के एक साथ राष्ट्रीय नीति बनाने की तरफ जाने की ज़रुरत है जिससे कुछ पार्टी गत नीतियों को छोड़कर किसी की भी सरकार आने जाने से देश के विकास पर कोई अंतर न पड़ सके.    
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