मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 16 February 2014

ममता और बंगाल

                                          पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने जिस सफाई से एक बात स्पष्ट कर दी है कि वे आगामी चुनावों के बाद भी बंगाल छोड़कर कहीं नहीं जा रही हैं उससे तीसरे मोर्चे के उन नेताओं में कुछ संतोष अवश्य आया होगा जो त्रिशंकु लोकसभा की स्थिति में खुद को देश के पीएम पद पर देखने के सपने संजोये बैठे हैं. ममता ज़मीन से जुड़े हुए उन नेताओं की कतार में अग्रणी हैं जो किसी भी मुद्दे पर आगे बढ़कर मोर्चा सँभालने और उसके बाद उस मुद्दे को उसके अंजाम तक पहुँचाने की ताकत रखती हैं जिसके कारण भी उनके व्यक्तित्व से हर पार्टी में भय और संशय दिखायी देता है. वर्तमान परिस्थितियों में यदि देखा जाये तो उन्होंने जिस संघर्ष के साथ दशकों से जमे हुए वामपंथियों के कुशासन से राज्य को मुक्ति दिलायी उससे उनकी क्षमताओं को कोई भी कम करके नहीं आंकना चाहता है और आज वे भी उस श्रेणी के नेताओं में जिन्होंने एक समय में संप्रग और राजग के साथ काम किया है पर आज वे अपने को किसी भी गठबन्धन के साथ सुखद स्थिति में नहीं महसूस करते हैं.
                                           यदि देश के सभी सीएम इस तरह से सोचें और अपने राज्य के समुचित विकास की बातें ही न करें बल्कि उन पर सख्ती से अमल करने के बारे में भी सोचते रहें तो देश में विकास की गति को काफी आगे किया जा सकता है पर जब दलगत भावना को पीछे छोड़कर देशहित की बातें सामने आती हैं तो अधिकांश राजनैतिक दल अपने उन स्थापित मानदंडों से आगे नहीं निकल पाते हैं जिनके दम पर देश को वास्तव में आगे बढ़ाने का काम किया जा सकता है. ममता की उपस्थिति से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है पर जिस तरह से रेल भाड़े को बढ़ाये जाने को लेकर उन्होंने अनावश्यक रूप से केंद्र से टकराव मोल लिया उसकी कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि कोई भी सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम आखिर कब तक सरकार के भरोसे जनता को बेहतर सेवाएं प्रदान कर सकता है ? यदि ममता जैसे नेता इन बातों को समझने का प्रयास करने लगें तो देश में और भी सही सोच को विकसित किया जा सकता है और उसका लाभ भी सीधे आने वाले समय में जनता को ही मिलने की सम्भावनाएं रहती हैं.
                                           देश के क्षेत्रीय मज़बूत नेताओं के साथ आज जो सबसे बड़ी समस्या है वह यह नहीं है कि वे देश का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं या नहीं बल्कि यह अधिक है कि क्या वे अपने राज्य से आगे बढ़कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर के किसी बड़े मुद्दे पर अपनी स्पष्ट राय रखते भी हैं या नहीं ? मोरारजी देसाई, वीपी सिंह, चन्द्र शेखर और देवगौड़ा जैसे नाम सहमति की राजनीति में तो फिट बैठ सकते हैं पर जब बड़े मुद्दों पर कोई बात कहनी हो तो इनका क्या रुख होता है यह देश ने बहुत बार देखा भी है. देश की सम्प्रभुता और क्षेत्रीय समन्वय को बढ़ाने के लिए आज बंगाल को जिस तरह से सोचने की आवश्यकता है तो उस स्थिति में क्या ममता ने बांग्लादेश के साथ सम्बन्धों को आगे बढ़ाने का काम किया है ? ममता का यह कथन सही ही है कि वे बंगाल से बाहर नहीं जाना चाहती हैं क्योंकि वे अपनी वर्तमान सीमाओं को अच्छे से जानती और समझती हैं और आने वाले समय में यदि आवश्यकता पड़ी तो शायद कभी वे पीएम पद के लिए खुद को तैयार भी कर पाएं ? देश के नेतृत्व के लिए जैसी क्षमता और धैर्य का परिचय हमारे नेताओं को देना होता है आज सम्भवतः देश के किसी सीएम में वह नहीं दिखता है फिर भी कितने ऐसे हैं जो ममता की तरह इस बात को इतनी सरलता से मानकर अपनी सीमाओं को निर्धारित करने की हिम्मत भी रखते हैं ?       
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