मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 23 March 2014

चुनावी रणनीति में उपचुनाव

                                    आम चुनावों में जिस तरह से बड़े नेता कई बार हारने के डर से तो कई बार अपनी पार्टी की हवा बनाने के लिए दो स्थानों से चुनाव लड़ते हैं जिससे उनको और उनकी पार्टी को तो तात्कालिक लाभ मिल जाया करता है पर उसके बाद होने वाले उपचुनाव के बारे में किसी का ध्यान इस तरह से नहीं जाता है क्योंकि तब यह अनावश्यक रूप से की जाने वाली कवायद ही होती है. इस सम्बन्ध में अब समय आ गया है कि नेताओं की इस तरह की प्रवृत्ति को रोकने के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून में उचित संशोधन किये जाएँ जिससे आने वाले समय में देश को अनावश्यक रूप से धन न खर्च करना पड़े. इस बार अभी तक केवल मुलायम और नरेंद्र ही दो बड़े नाम दो जगहों से चुनावी मैदान में दिख रहे हैं जिससे इनके दोनों जगहों से जीतने की स्थिति में उपचुनाव कराना आवश्यक हो जायेगा. आज के युग में इस तरह की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए सबसे अच्छा यही रहेगा कि इस समस्या से स्थायी रूप से निपटने के लिए अब उचित संशोधन भी किये जाएँ और नेताओं की इस तरह की मनमानी पर पूरी तरह से रोक लगायी जाए.
                                     इस तरह की दोहरी कवायद को रोकने के लिए चुनाव आयोग के पास व्यापक अधिकार आज नहीं है जबकि उसे इस बात का पूरा आधिकार होना चाहिए कि वो ही अपने स्तर से जीतने वाले प्रत्याशी का स्थान तय करे और किसी क्षेत्र विशेष में नेताओं की मनमानी के कारण होने वाले किसी भी उपचुनाव को रोकने हेतु उचित कदम उठाये. सबसे पहली बात तो यह की जा सकती है कि दो जगहों से लड़ने वाले प्रत्याशी से यह अधिकार ही छीन लिया जाए कि वह किस स्थान से संसद या विधान मंडल में जाना चाहता है क्योंकि जहाँ पर उसकी जीत का अंतर बड़ा हो उसे वहीं से अपने आप ही विजयी घोषित कर दिया जाना चाहिए. साथ ही दूसरे जिस भी स्थान से वह प्रत्याशी जीता हो वहाँ पर दूसरे स्थान पर आने वाले प्रत्याशी को भी विजयी घोषित कर दिया जाना चाहिए क्योंकि खेल में भी मैदान छोड़ने वाले को कोई महत्व नहीं दिया जाता है और जो मैदान में होता है वही विजयी घोषित कर दिया जाता है. जब इस तरह का नियम बन जायेगा तो एक सीट दूसरे के पास जाने के भय से नेता दो जगहों से मैदान में ही नहीं उतरेंगें.
                               देश में हर कानून केवल नेताओं की सुविधा के अनुरूप ही क्यों बनाये जाएँ इस बात का आखिर कोई नेता जवाब क्यों नहीं देना चाहता है ? वैसे भी आज के अधिकांश नेता आज देश के लिए एक बोझ से कम नहीं है तो उनके लिए इस तरह की सुविधाएँ दिए जाने का क्या मतलब बनता है ? जिस तरह से अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए कड़े कानून बनाये जा रहे हैं ठीक उसी तरह से किसी भी नेता को दो जगहों से लड़ने पर भी रोक लगायी जानी चाहिए और इसी क्रम में यह भी होना चाहिए कि यदि कोई विधान सभा सदस्य लोकसभा या राज्य सभा में चुना जाता है तो उस निर्वाचन क्षेत्र में दूसरे स्थान पर रहने वाले प्रत्याशी को प्रतिनिधित्व करने का अवसर दिया जाये क्योंकि जिस लोकतंत्र के चलते कोई विजयी होता है तो उसी लोकतंत्र के कारण ही कोई दूसरे स्थान पर भी तो आता है ? जीत हार का महत्व अपनी जगह है पर देश के चुनाव परिदृश्य को सुधारने की कोशिश बिलकुल अलग बात है. नेताओं के पास अपने लिए हर अनुचित बात को उचित साबित करने के लिए सदन होते हैं पर आम जनता के पास इनकी इस तरह की हरकतों से निपटने के लिए कुछ भी आखिर क्यों नहीं होना चाहिए ?      
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