मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 4 April 2014

ईवीएम फिर निशाने पर

                                                  भारतीय चुनावों में कुशलता के साथ समय प्रबंधन का बेहतर प्रदर्शन करने वाली इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) हमेशा से ही मतदान के समय छोटे मोटे विवादों का विषय भी बनती रहती हैं. इस बार एक बार फिर से असोम में एक मशीन में यह खराबी देखने को मिली कि किसी भी बटन को दबाने पर वोट केवल भाजपा के खाते में ही जा रहा था जिस पर प्रशिक्षण के दौरान पूरी तरह से राजनीति भी हुई और पूरे देश में इनकी जांच की मांग भी की गयी. वैसे तो इस तरह की मांग अधिकतर दल अपनी सुविधा के अनुसार ही किया करते हैं क्योंकि वे इस बहाने से दूसरे दलों पर दबाव बनाने की कोशिशे करते हैं कि वे हर तरह से चुनाव जीतना चाहते हैं. देश में होने वाले लोकसभा और विधान सभा चुनावों में ही इन ईवीएम का प्रयोग किया जाता है और इसके अतिरिक्त वे एक स्थान पर रखी जाती हैं, चुनाव से पहले इनकी विशेषज्ञों द्वारा गहन जांच की जाती है और तब ही इनको पूरी तरह से सुरक्षित घोषित करके वोटिंग के लिए मतदान केन्द्रों में रखा जाता है.
                                                  यह तो इनके जांच का पहला चरण होता है मतदान कर्मियों के रवाना होने से पहले इनकी एक बार फिर से जांच कर इनको मतदान अधिकारी को सौंपा जाता है जिसके बाद ये मशीने कड़ी सुरक्षा में हो जाती हैं इसलिए इनका किसी तरह से दुरूपयोग किया जाना सम्भव नहीं होता है. चुनाव के दिन भी मतदान शुरू से पहले एक बार सभी दलों के पोलिंग एजेंटों के सामने एक बार फिर से इसका प्रदर्शन किया जाता है और सभी के संतुष्ट हो जाने पर ही इसको शून्य करके मतदान शुरू कराया जाता है. इसके बाद मतदान सम्पन होने पर इको कड़ी सुरक्षा में जिले स्थिति मतगणना केन्द्रों तक पहुँचाया जाता है जहाँ पर किसी के भी आने जाने पर पूरी तरह से पाबन्दी लगी होती है और सुरक्षा बलों के पास हर तरह के अधिकार भी होते हैं तो वहाँ पर भी किसी तरह की गड़बड़ी किये जाने की सम्भावना पूरी तरह से समाप्त ही हो जाती है. कोई भी दल इतना अनभिज्ञ नहीं होता है कि इन मशीनों के इन कामों को अच्छी तरह से न जनता हो.
                                                  अच्छा हो कि देश के सभी दल इस तरह की तकनीकी गड़बड़ी आने पर बिना बात का हो हल्ला न मचाएं और स्थानीय प्रशासन और चुनाव आयोग के साथ पूरी तरह से तालमेल बिठाएं जिससे इनके किसी भी तरह के दुरूपयोग को समय रहते ही रोका जा सके. मशीनों में गड़बड़ी भी सम्भव है पर आज जिस तरह से मीडिया और नेताओं के साथ चुनाव आयोग की नज़रें भी इस तरह की किसी भी गड़बड़ी पर ही टिकी रहती हैं तो यह काम इतनी आसानी से नहीं किया जा सकता है. वैसे तो यह तकनीकी कमी ही अधिक लग रही है फिर भी यदि मान लिया जाये के असोम में किसी भाजपा समर्थक कर्मचारी ने मशीन में कुछ कर दिया था तो भी वह समय रहते पकड़ी ही गयी तो अब इन मशीनों पर संदेह करने का क्या मतलब बनता है ? भारत की इन मशीनों को विश्व भर में सराहा जाता है पर हमारी अपनी राजनीति के चलते हम ही इनके सबसे बड़े आलोचक बनकर सामने आ जाते हैं. इन मशीनों के आने से जहाँ चुनावों में पारदर्शिता के साथ तेज़ी आयी है वहीं इनके कामकाज ने देश दुनिया को पूरी तरह से आश्वस्त भी किया है.
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