मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 14 May 2014

सीबीआई और सुधार

                                      सुप्रीम कोर्ट की तरफ से आये एक निर्णय के बाद जहाँ सरकार के आला अधिकारियों के खिलाफ जांच करने के लिए किसी भी तरह की अनुमति की आवश्यकता वाले प्रावधान को रद्द किये जाने से सीबीआई की जांचों में तेज़ी आने की आशा जगी है क्योंकि अभी तक किसी बड़े अधिकारी के किसी मामले में संदिग्ध पाये जाने पर एजेंसी उनके खिलाफ अपने स्तर से जांच नहीं कर सकती थी और उसे सरकार से पूर्व अनुमति लेनी पड़ती थी. जब सरकार के बड़े अधिकारी पर जांच की तलवार लटकती थी तो सरकार भी इस तरह की जांचों के लिए कुछ विशेष दिलचस्पी नहीं दिखाया करती थी जिस कारण से भी कई बार सबूत नष्ट किये जाने से लेकर जांचों को प्रभावित किये जाने तक के मामले भी सामने आते रहे हैं. सरकार द्वारा कोर्ट के दबाव में ही सही पर जिस तरह से कुछ आज़ादी देने की कोशिशें शुरू की गयी थी उनमें अब यह बाध्यता समाप्त होने से एजेंसी के लिए स्थिति और भी आसान हो गयी है.
                                             किसी भी बड़े निर्णय के अच्छे और बुरे दोनों तरह के परिणाम सामने आते रहते हैं जिससे भी पूरी व्यवस्था पर असर पड़ता है इस आदेश से जहाँ सीबीआई को बड़े सरकारी अधिकारियों के खिलाफ जांच में असीमित अधिकार मिल गए हैं वहीं इन अधिकारों के दुरूपयोग की संभावनाएं भी बढ़ गयी हैं. सीबीआई के वर्तमान निदेशक रंजीत सिन्हा ने इस आदेश के बाद भी जिस तरह से एजेंसी में एक नए आदेश द्वारा अधिकारियों को निर्देशित किया है कि संयुक्त सचिव या उससे ऊपर के रैंक के अधिकारी की जांच करने से पहले अधिकारी सीबीआई के अतिरिक्त निदेशक स्तर के अधिकारी से अनुमति ले लें उससे स्थितियों को सँभालने में सही मदद मिल सकती है क्योंकि कई बार कुछ अधिकारी अति उत्साह में कुछ भी करने से बाज़ नहीं आते हैं. एजेंसी के काम पर अब आसानी से कोई उंगली न उठा सके इसके लिए भी एजेंसी को चौकन्ना ही रहना होगा क्योंकि हर परिवर्तन के अच्छे व् बुरे दोनों तरह के पहलू हुआ करते हैं. 
                                                आज़ादी के बाद जिस तरह से नेताओं में नैतिकता थी तो उसे देखते हुए यह माना गया था कि किसी भी तरह की अनियमितता पाये जाने पर उसकी सही तरह से जांच में नेता आड़े नहीं आयेंगें पर अब पूरे मामलों को देखने के बाद यह लगने लगा है कि समय के साथ वह सोच गलत साबित हो चुकी है और उसे अब बदलने की ज़रुरत भी है. जैसे यह बात नेताओं और सरकारी अधिकारियों पर लागू होती है वैसे ही सीबीआई अधिकारियों पर भी लागू होती है. यह सही है कि कोर्ट के माध्यम से सीबीआई को जो कुछ मिल रहा है उसे कहीं अधिक रंजीत सिन्हा भी अपनी रणनीति के तहत एजेंसी को सुधारने में लगे हुए हैं. उनके यह प्रयास कहाँ तक सफल होते हैं यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा, देश में सत्ता परिवर्तन के साथ अब नयी सरकार क्या उन्हें इस पद पर देखना भी चाहेगी या नहीं क्योंकि भाजपा ने उस समय सिन्हा की नियुक्ति का पुरजोर विरोध किया था और संभवतः उसी मंशा से काम करने की दशा में उनका पद पर बने रह पाना भी मुश्किल साबित हो सकता है.  
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