मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 2 May 2014

अब अबू आसिम आज़मी

                                           लोकसभा चुनावों ने इस बार विवादित बयानों की एक नयी और बहुत ही घटिया इबारत लिखने में कोई कसर नहीं छोड़ी है और अब जब चुनाव अपने अंतिम चरणों की तरफ बढ़ चला है तो सपा के अबू आसिम आज़मी का एक बयान ऐसा आया है जिस पर उन्होंने भी गिरिराज सिंह जैसी भाषा का ही प्रयोग किया है. भारतीय चुनाव में जिस तरह से कुछ मतों के ध्रुवीकरण के लिए ही नेता अपनी समाज और धर्म की मर्यादाएं भूल जाते हैं संभवतः वैसा कहीं और देखने को काम ही मिलता हो. इस बार आज़मी ने जिस तरह से सपा के समर्थन में न आने वाले मुसलमानों को कौम का दगाबाज और सच्चा मुसलमान न होने पर जो बयान दिया है वह कहीं न कहीं से भारतीय कानून की कमज़ोरी को ही दर्शाता है क्योंकि इस तरह से कोई भी कुछ भी कहकर कुछ समय के लिए विवादों में आ जाता है और सबसे दुर्भाग्य पूर्ण यह भी होता है कि कुछ वोटों की चाह में लगी हुई पार्टियां भी ऊपरी मन से भी इन बयानों की निंदा नहीं करना चाहती हैं.
                                           इस तरह के बयानों से निपटने के लिए आखिर भारतीय कानून और चुनाव आयोग के पास व्यापक शक्तियां क्यों नहीं हैं आज यही चिंता का विषय बना हुआ है क्योंकि जब तक कानून के पास इन फालतू के बयान देने वाले नेताओं को कड़ी सजा देने का अधिकार नहीं होगा इनकी जुबान पर रोक लगाना नामुमकिन ही रहने वाला है. आज के परिदृश्य में चुनाव आयोग केवल मुक़दमा दर्ज करने के आदेश ही दे सकता है और अनमने मन से पुलिस को भी अपने राज्य में सत्ताधारी दल के नेताओं के खिलाफ रिपोर्ट लिख भी लेती है पर चुनाव निपट जाने के बाद उसी पुलिस को इस पर विवेचना और रिपोर्ट लगानी होती है जो कि कभी भी ऐसा सोच भी नहीं सकती है ? ऐसे में इन चुनावी मुक़दमों को दर्ज़ कराने का मतलब ही क्या बनता है जिनमें दोषियों को कोई सजा ही न दी जा सके और वे अगली बार फिर कोई बकवास करने के लिए स्वतंत्र रूप से भारतीय लोकतंत्र में गंदगी फ़ैलाने के लिए घूमने में सफल हो जाएँ ?
                                          आज़मी जैसे नेताओं को पहले अपना ही डीएनए टेस्ट करवा लेना चाहिए क्योंकि एक कुर्सी और चंद वोटों के लालच में वे जिस तरह से सपा की चरण वंदना करने में लगे हैं क्या वो कौम से गद्दारी नहीं है ? मसला मुस्लिम समाज से जुड़ा हुआ है इसलिए आज़मी का विरोध वहीं से होना भी चाहिए पर अपने राजनैतिक स्वार्थ के लिए हर दल के मुस्लिम नेता जैसी हरकतें करते रहते हैं उस परिस्थिति में किसी भी कोने से कोई आवाज़ सुनाई देना नामुमकिन ही लगता है. कायदे से तो इन लोगों के विरुद्ध कड़े कदम उठाये जाने चाहिए पर सदन में बैठकर इसी घटिया मानसिकता के साथ नेता देश को चलाने के लिए इकट्ठे होते हैं तो उनसे अपने विरुद्ध कठोर नियम बनाने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है ? आज आवश्यकता है कि चुनाव से सम्बंधित मामलों की सुनवाई के लिए देश में अलग से चुनावी कोर्ट हो और इस तरह के विावदित बयान देने वाले हर नेता के खिलाफ की जाने वाली शिकायतों पर चुनाव के बाद भी चुनाव आयोग के दिशा निर्देशों के अनुसार मुक़दमें की कार्यवाही पूरी भी की जाये जिससे सभी बकवास करने वाले नेताओं को भी देश में कानून के होने का एहसास हो सके.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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