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Wednesday, 18 June 2014

राज्यपालों की नियुक्ति और बदलाव

                                                                 देश में जिस तरह से सरकारें बदलने के साथ ही राज्यों में सरकार की कृपा से टिके हुए राज्यपालों के लिए बदलाव का समय शुरू हो जाया करता है उसे देखते हुए इसमें व्यापक राजनीति की गुंजाईश भी सदैव ही बनी रहती है. इस बार भी जिस तरह से राज्यपालों को हटाये जाने की एक नीति के तहत ही केंद्र सरकार ने उनके लिए एक नीति पर काम करना शुरू किया है उससे यह राजनीति फिर से आगे बढ़ने की पूरी सम्भावना भी है. वैसे यदि देखा जाये तो देश में राज्यपालों के पद को पूरी तरह से राजनैतिक पारी ख़त्म कर चुके नेताओं के लिए अपने समय को अच्छे से व्यतीत करने का एक साधन मात्र ही माना गया है और उनके पास अधिकारों के नाम पर कुछ भी नहीं होता है और तकनीकी रूप से वे राज्य सरकार की नीतियों का समर्थन करने के लिए बाध्य ही रहा करते हैं तो इनकी नियुक्ति की आवश्यकता पर ही यदि प्रश्न चिन्ह लगाया जाये तो कुछ भी गलत नहीं होगा ?
                                                                   राजग सरकार ने जिस तरह से राज्यपालों को तीन समूहों में बांटकर अपनी नीति पर काम करना शुरू कर दिया है उससे उसकी मंशा का ही पता चलता है. पहले वर्ग में वे हैं जिनका कार्यकाल लगभग पूरा होने को है तो उनकी राजनैतिक निष्ठा को दरकिनार करते हुए कार्यकाल पूरा करने तक हटाने की प्रक्रिया नहीं अपनायी जाने वाली है, दूसरे समूह में वे हैं जो पूरी तरह से राजनैतिक लोग हैं और कांग्रेस के कार्यकर्त्ता रहे हैं तो उनको हटाने के लिए अभी से प्रयास शुरू कर दिए गए हैं तीसरे समूह में सेना और पुलिस बलों के साथ अन्य क्षेत्रों के लोगों को रखा गया है जिन पर सरकार फिलहाल कोई बदलाव नहीं करना चाहती है. संप्रग सरकार ने भी २००४ में इसी तरह से राजनीति करते हुए कई राज्यपालों को बदल दिया था जिसके बाद यह मामला कोर्ट में भी गया और यह आदेश पारित किया गया कि बिना उचित कारण राज्यपालों को हटाया नहीं जाना चाहिए.
                                                              जब इस नियुक्ति में पूरी तरह से राजनीति हावी ही रहा करती है तो विरोधी दलों को नैतिक आधार पर कुछ भी कहने का हक़ नहीं है क्योंकि जब वे सत्ता में थे तो उन्होंने ने भी इसी तरह के काम किये थे. नैतिकता की दुहाई केवल विपक्ष में बैठकर ही नहीं दी जा सकती है क्योंकि नैतिकता के मायने नेता अपनी सुविधा के अनुसार बनाने और बिगाड़ने में सदैव से ही माहिर रहे हैं. अच्छा ही इस बारे में इनकी आवश्यकता और नियुक्ति पर ही पुनर्विचार किया जाये और राज्यों के मुख्य न्यायाधीशों के माध्यम से निर्वाचित सीएम को शपथ दिलाई जाये और उसके बाद सभी मंत्री सीएम से संविधान की रक्षा की शपथ लें. यदि इस तरह की किसी प्रक्रिया को चला पाना आसान नहीं है तो राज्यपालों की नियुक्ति को या तो पूरी तरह से केंद्र सरकार के आधीन कर दिया जाये जिससे उसके फैसले के खिलाफ कोई कोर्ट भी न जा सके या फिर इनके कार्यकाल को केवल एक वर्ष का कर दिया जाये और ये साल में एक बार राष्ट्रपति भवन जाकर फिर से एक वर्ष की शपथ लेकर वापस आएं जिससे किसी भी सरकार के लिए इन्हें हटाने के अवसर कानूनी तौर पर भी मिल सकें.     
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