मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 17 June 2014

फिर से उलझता इराक

                                      शिया-सुन्नी विवाद के चलते एक बार इराक फिर से दुनिया का सबसे खतरनाक क्षेत्र बनने की तरफ जाता हुआ दिखाई देने लगा है क्योंकि वहां की शिया समर्थित सरकार के खिलाफ जिस तरह से इराक और सीरिया में सक्रिय सुन्नी चरमपंथी गट आईएसआईएस ने अचानक ही अपनी गतिविधियों को बढ़ाते हुए सामरिक महत्व के शहरों पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया है उससे वहां के आम नागरिकों की ज़िंदगी एक बार फिर से नारकीय ही होने वाली है. जब किसी देश पर सरकार का आधा अधूरा ही नियंत्रण हो और आतंकियों द्वारा इस तरह से हज़ारों की संख्या में सैनिकों का अपहरण कर उन्हें सामूहिक रूप से मौत के घाट उतारा जा रहा हो तो वैश्विक रूप से चिंताएं बढ़नी स्वाभाविक ही हैं. इराक १९९१ से ही पूरी दुनिया के लिए एक बुरे सपने जैसा बना हुआ है और उसकी परिस्थितियों में किसी भी प्रकार को कोई अंतर नहीं दिखाई देता है आर्थिक पहलुओं को इराक में जिस तरह से धर्म के साथ जोड़ दिया गया है यह साड़ी समस्या उसी का परिणाम ही दिखाई देती हैं.
                              इराक की प्राकृतिक संसाधनों की सम्पन्नता ही आज उसके लिए बहुत बड़ा अभिशाप बनकर सामने आ रही है और वहां के तेल और प्राकृतिक गैस भंडारों पर कब्ज़ा करने की नीति के चलते ही जिस तरह से कभी न समाप्त होने वाला संघर्ष सामने आता दिख रहा है उस परिस्थिति में विश्व भर के देश आखिर इराक के लिए क्या कर सकते हैं यह भी सोचने का विषय है ? अमेरिका पहले ही वहां फँस कर अपने लिए बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर चुका था इसलिए वह आज की परिस्थिति में वहां पर किसी भी तरह की कोई ज़मीनी लड़ाई नहीं लड़ना चाहेगा पर आवश्यकता पड़ने पर वह चरमपंथियों के ठिकानों पर अपने खाड़ी में खड़े हुए विमानवाहक पोत से हवाई हमले कर सामरिक रूप से इराक सरकार की मदद अवश्य ही करना चाहेगा. इस तरह की मदद से जहाँ अमेरिका के सैनिक और हित सुरक्षित रहेंगे वहीं उसके नुकसान को सीमित भी रखा जा सकेगा.
                                            मध्य पूर्व की यह हकीकत जिस तरह से वहां पर रहने वाले सम्पूर्ण इस्लामिक अनुयायियों के लिए एक दुःस्वप्न बनती जा रही है आज उसका कोई हल सामने नहीं आ रहा है. ईरान ने इस मसले पर जिस तरह से अमेरिका के साथ बातचीत की संभावनाओं से इंकार नहीं किया है उस परिस्थिति में ईरान कि भूमिका भी पूरे क्षेत्र में बढ़ सकती है. अच्छा हो कि इस तरह के धार्मिक मामलों से जुड़े संघर्षों में यदि स्थानीय देशों की सरकारें आगे बढ़कर पूरे क्षेत्र को सुरक्षित रखने की बात सोचें और अमेरिका और पश्चिमी देशों को पूरे माहौल का लाभ उठाने से भी रोकने की कोशिशें की जाएँ. इस मामले में तेल उत्पादक देशों के साथ ही इस्लामी देशों के संगठन को भी पहल करने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक इस धार्मिक समस्या का स्थानीय उपाय नहीं खोजा जायेगा तब तक अमेरिका और उसके मित्र देशों को यहाँ अपने आर्थिक हित साधने के लिए आने से कोई नहीं रोक पायेगा. अन्य देशों के दखल से इस तरह के पूरे संघर्ष में सबसे बड़ा नुकसान यहाँ की इस्लामी जनता को ही सामाजिक और आर्थिक रूप से उठाने को मजबूर होना पड़ेगा और उनके लिए जीवन और भी कठिन ही साबित होने वाला है.    
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