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Friday, 4 July 2014

भारतीय रेल की गौरव गाथा

                                               १८४५ में सर जमशेद जी जीजी भाई और जगंन्नाथ शंकरशेठ द्वारा देश में रेल की परिकल्पना से भारतीय रेल एसोसिएशन के गठन के बाद जिस तरह से मुंबई और ठाणे के बीच के २१ मील लम्बे मार्ग पर १६ अप्रैल १८५३ को १४ डब्बों की पहली भारतीय ट्रेन को सुल्तान, सिंध और साहब नामक तीन लोकोमोटिव के माध्यम से ४५ मिनट में तय कर इतिहास की शुरुवात की थी वह निरंतर ही आएगे बढ़ती हुई दिखाई दे रही है. दिल्ली आगरा मार्ग पर जिस तरह से सेमी हाई स्पीड की ट्रेन का सफल परीक्षण और सञ्चालन किया गया वह भारतीय रेल के कुशल होने का एक और प्रमाण है. अभी तक आज़ादी के बाद से जिस तरह से भारतीय रेल को अपने आज़ादी पूर्व ४०% रेल नेटवर्क के पाकिस्तान में जाने के बाद नयी चुनौतियों का सामना करना पड़ा तब से आज तक उसने विकास की इस गाथा में पीछे मुड़कर नहीं देखा है. आज भी भारतीय रेल अपने सीमित संसाधनों के माध्यम से आगे बढ़ने को कृत संकल्प दिखाई देती है जो उसकी मूल शक्ति का स्रोत भी है.
                                             आज जम्मू से सीधे माता वैष्णो देवी के मंदिर के आधार कटरा स्टेशन तक पहली ट्रेन को पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा हरी झंडी दिखाकर रवाना किया जायेगा उससे भारतीय रेल के निरन्तर आगे बढ़ने की गाथा को ही सम्मान मिलता है. उधमपुर से कटरा तक के मार्ग पर जाने वाले मार्ग के शुरू हो जाने से जहाँ भारतीय रेल की पहुँच जम्मू और कश्मीर राज्य में और आगे तक हो जाने वाली है वहीं उसकी कश्मीर घाटी तक सीधी ट्रेन चलाने की योजना पर भी तेज़ी से काम आगे बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है. भारतीय रेल ने इन चुनौतियों का जिस तरह से विपरीत परिस्थितियों में भी सही तरह से सामना किया है वह अपने आप में बहुत ही अद्भुत काम लगता है जिसके लिए रेल कर्मचारी और अधिकारी पूरी लगन एक साथ काम करते रहते हैं. जम्मू से आगे बढ़ती हुई ट्रेन घाटी के उन लोगों के लिए एक वरदान साबित हो सकती है जिनके पास आज तक बेहतर यातायात के लिए कोई साधन उपलब्ध नहीं हैं.
                                            भाजपा द्वारा किये गए चुनावी वादे के अमल पर भी निजी क्षेत्र को शामिल कर आगे बढ़ने की कोशिश रेलवे द्वारा प्रारंभिक स्तर पर शुरू कर दी गयी है. भारतीय रेल को पूरी तरह से राजनीतिक नियंत्रण से यदि मुक्त कर व्यावसायिक तौर पर चलाने का निर्णय कर लिया जाये तो इसमें लाभ कमाने की अपार क्षमता छिपी हुई है. हमारे नेताओं को यह समझना ही होगा कि रेल को अधिक दिनों तक उनकी राजनैतिक आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. आज भी देश में सामान्य परिचालन से जुड़ी समस्याओं के चलते ट्रेन में अधिक भीड़ और अव्यवस्था दिखाई देती है उसे केवल बेहतर प्रबंधन के माध्यम से ही सुधारा जा सकता है. रेल के विकास के लिए इसमें अधिकांश मामलों को एक मज़बूत रेल प्राधिकरण के अंतर्गत लाया जाना ज़रूरी है क्योंकि वर्तमान तंत्र पर अधिक भार डालने के स्थान पर अब इस भार मुक्त करने की दिशा में तेज़ी से सोचने की ज़रुरत है और जब तक रेलवे इस मसले पर ध्यान नहीं दे पायेगी तब तक उसका समग्र विकास संभव नहीं हो सकता है. भारतीय रेल की गौरव गाथा
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