मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 16 August 2014

न्यायपालिका और विधायिका

                                                                     आज़ादी के समारोहों में जहाँ पूरा देश हमेशा की तरह नेताओं की बातों पर ध्यान देने में ही लगा हुआ है वहीं देश के चीफ जस्टिस इस तरह के समारोह में कोलेजियम के स्थान पर आने वाली नयी व्यवस्था को लेकर सशंकित ही नज़र आये. अपने विचारों को पहले भी अपनी तरह से स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा था कि कोलेजियम सिस्टम में अपने आप में कोई कमी नहीं है पर इसमें भी कमियां खोजी जा सकती है जिन पर विचार किया जाना चाहिए पर नेताओं के पक्ष में अधिक न रहने वाले सुप्रीम कोर्ट के रुख को देखते हुए अब सरकार का दखल बढ़ाने के लिए जितनी शीघ्रता से सभी दलों ने सरकार द्वारा प्रस्तावित नए तंत्र के पक्ष में मत दिया वह भारतीय नेताओं की मानसिकता को ही दिखाता है. आज भ्रष्टाचार की आंच देश के हर क्षेत्र में दिखाई देती है तो यदि वह कुछ हद तक न्यायपालिका में भी है तो इसमें नयी बात क्या है फिर भी देश के सुप्रीम कोर्ट और राज्यों के हाई कोर्टों द्वारा अभी तक बहुत अच्छा काम किया जा रहा है जिससे अधिकतर नेताओं को समय समय पर दिक्कत होती रहती है.
                                                           इस नए तंत्र में जिस तरह से नेताओं की भूमिका को भी महत्वपूर्ण कर दिया गया है उसे देखते हुए आने वाले समय में न्यायपालिका और विधायिका में टकराव बढ़ने की पूरी संभावनाएं भी है जिनका असर देश के पूरे न्यायतंत्र पर ही अधिक पड़ने वाला है. सरकार के पास आज जो विकल्प हैं उसने उन पर ही काम करते हुए इस तरह के परिवर्तन के बारे में विचार किया और उस पर आगे कदम भी बढ़ाये पर अब समय आ गया है कि इस तरह के बदलाव इतनी छोटी तरह से न किये जाएँ और आने वाले समय में पूरे देश में केवल कृपा के आधार पर ही जजों की नियुक्ति करने के स्थान पर उनकी क्षमताओं का भी आंकलन शुरू किया जाये. अखिल भारतीय स्तर पर अब एक न्यायिक परीक्षा का आयोजन होना चाहिए और जिस तरह से अन्य अखिल भारतीय सेवाओं के लिए पूरे कैडर का विकास किया जाता है अब न्यायपालिका में भी कुछ उसी तरह से काम करने की आवश्यकता पर सोचने की आवश्यकता है.
                                                         इस तरह के बदलाव जहाँ पूरे देश के लिए आने वाले समय में जजों की कमी से निपटने में भी कारगर साबित होंगें वहीं किसी भी सरकार पर इस बात का आरोप भी नहीं लग पायेगा कि उसने किसी वकील या जज को अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर आगे बढ़ा दिया है. आज जिस तरह से राज्य सरकारें अपने चहेतों के नामों को आगे करती हैं और कोलेजियम से पास होने के बाद उनकी नियुक्ति कर दी जाती है तो इसमें बहुत सारे काबिल लोग केवल चापलूसी न कर पाने के कारण भी न्यायिक तंत्र में निर्णायक हिस्सा बनने से रह जाया करते हैं. जब किसी भी बड़े बदलाव को किया जाये तो उसमें सभी संभावित बातों पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता है पर सरकार ने अब न्यायपालिका में भी नेताओं के खुले तौर पर दखल को बढ़ावा देने की पूरी कोशिश की है जो हर स्तर पर दलीय भावना से ऊपर उठकर सभी दलों के नेताओं द्वारा आज के समय में अधिक सक्रिय होती न्यायपालिका के पर कतरने जैसा ही अधिक है. आज लोग जिस परिवर्तन को क्रन्तिकारी मान रहे हैं आने वाले समय में वह केवल जजों पर दबाव बढ़ाए जाने का केवल एक नया तंत्र ही साबित होने वाला है.  
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