मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 27 September 2014

पाक का यूएन में राग कश्मीरी

                                                         एक बार फिर से पाक के पीएम ने संयुक्त राष्ट्र के वार्षिक अधिवेशन में जिस तरह से कश्मीर का मुद्दा उठाया है और उसके बाद एक बात तो स्पष्ट ही हो गयी है कि अब भी पाक को अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए कश्मीर की ज़रुरत पड़ती है और भविष्य में भी पड़ती ही रहने वाली है. नवाज़ शरीफ ने जिस तरह से कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के तहत एक बार फिर से जनमत संग्रह की बात की है उससे यही लगता है कि वे भी अपनी पूर्ववर्ती सरकारी सोच से आगे बढ़ना ही नहीं चाहते है क्योंकि आज के दौर में जिस तरह से वे पाक में लगातार कमज़ोर होते जा रहे हैं और सेना द्वारा सत्ता पलट की आशंका रोज़ ही जताई जा रही है तो उस परिस्थिति में सेना और चरमपंथियों को खुश करने के लिए उनका इस तरह से बात करना एक बड़ी मजबूरी भी है. पाक में सेना और चरम पंथियों का सरकार पर सदैव ही दबाव बना रहता है जिससे बाहर निकलने के लिए आज तक लोकतान्त्रिक ढंग से चुने हुए नेताओं ने कोई ठोस प्रयास नहीं किया है.
                                                        आज भारत की प्रगति और विश्व में बढ़ती हुई लोकप्रियता और मांग के चलते पाक ने इस बार दोहरा खेल खेलने की कोशिश भी की है और उसने जिस तरह से संयुक्त राष्ट्र के सुधार कार्यक्रम और उसके विस्तार पर वर्तमान में चल रही किसी भी प्रक्रिया पर पूरी तरह से रोक लगाने की बात कही है वह अप्रत्यक्ष रूप से भारत की नयी परिषद में भविष्य की संभावनाओं पर विराम लगाने की एक कोशिश ही है. पाक को भारत का महत्व कभी भी समझ में नहीं आने वाला है क्योंकि जब भी भारत पाक के साथ मज़बूत सम्बन्ध बनाने की गंभीर कोशिश शुरू करता है पाक की तरफ से कुछ अजीब व्यवहार ही किया जाता है. यह बात वहां की सेना के पक्ष में है क्योंकि भारत के साथ पाक जितने अधिक संघर्ष की स्थिति में रहेगा पाक सेना को बजट मिलने में उतनी ही आसानी रहने वाली है तो वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी क्यों मारना चाहेगी ? भारत में पाक के इस इरादे को हर सरकार ने समझा है और आने वाले समय में इसे समझने में कोई समस्या भी नहीं आने वाली है जिससे पूरा परिदृश्य सामने स्पष्ट ही है.
                                                        भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन ने जिस तरह से यह स्पष्ट किया है कि पीएम की तरफ से पाक एक बयान का जवाब दिया जायेगा संभवतः उसकी भी कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि पाक इस तरह से भारतीय पीएम के बड़े परिदृश्य को छोटा करने में सफल हो जायेगा और भारत से वैश्विक बिरादरी को जो भी आशाएं हैं उनके लिए समय कम मिल पायेगा ? पाक के बयान को एक दो पंक्तियों में अंतिम चरण में जवाब देने से जहाँ भारतीय पक्ष को मज़बूती मिलने वाली है वहीं भारतीय नेतृत्व की परिपक्वता का भी पता चलने वाला है. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का बयान भी पाक को महत्त्व देने वाला ही रहा जिसमें उन्होंने पूरा खेल बिगाड़ने के लिए पाक पर ही ठीकरा फोड़ दिया जबकि इस महत्वपूर्ण दौरे में पाक को भारतीय पक्ष द्वारा इस तरह के किसी भी जवाब की कोई बड़ी आवश्यकता नहीं थी. यह भारतीय पीएम का यूएन में पहला सम्बोधन होगा तो इसमें यदि पाक जैसे देशों की अनदेखी की जा सके तो यह बहुत अच्छा होगा क्योंकि जवाब देकर हम पाक की बराबरी करने की स्थिति में पहुँच जायेंगे और दुनिया के देशों के सामने हमारी अन्य प्राथमिकताएं नहीं आ पाएंगीं.         
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