मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 3 December 2014

साध्वी - संत या नेता

                                                              ४७ वर्षीय कथावाचक, छोटे परन्तु असफल वैवाहिक जीवन के बाद विश्व हिंदू परिषद के नेता अशोक सिंघल के करीबी स्वामी परमानन्द के आश्रम में जाने के बाद अपने विवादित बयानों के लिए जाने जानी वाली निरंजन ज्योति के दिल्ली में दिए गए बयान के बाद संसद से सड़क तक हल्ला मचा हुआ है. अपने बड़बोले पन के कारण आज मोदी के लिए अस्थायी संकट बन चुकी केंद्रीय मंत्री की बलि लेने के लिए विपक्ष पूरी तरह से तैयार बैठा है पर खुद व्यक्तिगत हमले और विवादित बातें करने वाले पीएम की तरफ से यूपी में पार्टी के हित साधने की कोशिशों में संभवतः वे अपने मंत्री पद पर बनी रह सकती हैं परन्तु उन्होंने साध्वी होने के बाद भी अपने वैचारिक स्तर का प्रदर्शन तो कर ही दिया है. मात्र इंटरमीडिएट शिक्षित हमीरपुर की पूर्व विधायक निरंजन को उनकी इस तरह की हरकतों के बाद क्या हिन्दू धर्म के अनुसार वे साध्वी कहलाने लायक भी हैं आज यह प्रश्न समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ भी बोलकर प्रतिष्ठा पाने की इस तरह की लालसा केंद्रीय नेताओं की नज़रों में तो किसी को चढ़ा सकती है पर उसका समाज पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ सकता है .
                                        यूपी की राजनीति में सारथी अमित शाह के साथ अपनी पहली विजय के बाद मोदी को इस बात का एहसास हुआ कि यूपी गुजरात नहीं है और यहाँ पर भावनाओं में बहकर वोट करने की आदत लोगों में हमेशा से ही रही है तो २०१७ के चुनावों में जातीय समीकरणों को साधने के लिए यूपी की ५% आबादी वाली निषाद जाति से आने वाली निरंजन ज्योति को केवल इसीलिए मंत्री पद दिया गया था कि भविष्य में इस जाति को इनके माध्यम से साधा जायेगा. विवादित बयानों के अलावा भी ज्योति लोकसभा चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी भाजपा के कार्यकर्ताओं के साथ ही एक मामले में उलझ चुकी हैं और मामला यहाँ तक बिगड़ा था कि पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा था. अब जब संसद में उन्हें अपने इस विवादित बयान की वास्तविकता पता चल गयी है तो वे अब इसे अपनी फिसली हुई ज़बान कहकर मामले को सुलटाने के चक्कर में हैं. राजनैतिक मजबूरी मज़बूत पीएम से भी क्या करवा सकती है यह इस मामले में स्पष्ट है और आने वाले समय में भी इनविवादित लोगों के लिए केवल संसदीय बोर्ड की बैठक में मोदी के पास चेतावनी देने के अलावा कुछ भी नहीं है.
                                     देश में नेताओं के पास मुद्दों की कमी और कमज़ोर राजनैतिक समझ होने के कारण ही वे जनता का ध्यान बंटाने के लिए इस तरह की बयानबाज़ी करने से पीछे नहीं हटते हैं. विपक्षियों पर व्यक्तिगत हमले करने और हलके बयान देने में खुद पीएम भी कभी पीछे नहीं रहते हैं जिससे इन छुटभैय्ये नेताओं का मनोबल भी पूरा होता रहता है और वे भी जानते हैं कि उनका कुछ भी नहीं बिगड़ने वाला है. देश के लिए जो कुछ भी सही है नेता उसे अपने हिसाब से सही और गलत साबित करने में जुट जाते हैं जिससे परिस्थितियां इस हद तक बिगड़ जाती हैं. संतों के इस तरह के आचरण का हिन्दू धर्म में विरोध किया जाना चाहिए तथा साथ ही सभी दलों के नेताओं को इस बात पर विचार करना चाहिए कि इस तरह के बयान देने वाले किसी भी नेता पर स्वयं पार्टी द्वारा ही कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाएगी.और उनको पार्टी या सरकार में महत्वपूर्ण स्थान देने से भी रोका जायेगा तथा भविष्य में कम से कम एक चुनाव में लड़ने से पाबन्दी भी लगायी जाएगी जिससे आने वाले समय में इस तरह के अशोभनीय बयानों को राजनीति से पूरी तरह से अलग किया जा सके.              
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