मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 21 January 2015

जन-धन योजना और यथार्थ

                                                              अगस्त महीने में केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गयी प्रधानमंत्री जनधन योजना ने जहाँ रिकॉर्ड समय में अधिकतम खाते खोलने के लक्ष्य को पाने में सफलता पायी जिसके कारण उसे गिनीस बुक में भी जगह मिल गयी है जो कि देश के लिए गर्व की बात है वहीं इस योजना को जिस तरह से पूरी जागरूकता के साथ चलाया जाना चाहिए था उसकी कमी के चलते आने वाले समय में इससे नयी तरह की समस्याएं भी सामने आ सकती हैं. भविष्य में सरकार को अपनी सब्सिडी का बोझ कम करने की आवश्यकता पड़ने ही वाली है जिसके लिए पिछले एक दशक से काम किया जा रहा था तथा देश में पेट्रोलियम उत्पादों पर दी जाने वाली सब्सिडी से निपटने के लिए के चरणबद्ध योजना बनाकर आज देश उससे पीछा छुड़ा चुका है. अब भी देश में बहुत सारी ऐसी योजनाएं चल रही हैं जिनमें बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार किया जाता है और उनसे निपटने के लिए सरकार को एक नए तंत्र की आवश्यकता महसूस हुई थी जिसके तहत ही सुदूर के गांवों में बैंकों को सीबीएस करने और २०१४ तक लोगों के लिए खाते खोलने का लक्ष्य २०१२ में ही तय कर दिया गया था.
                 आज उस तंत्र की मज़बूती और उपस्थिति के चलते ही सरकार ने यह आयाम प्राप्त करने में सफलता पायी है पर नियमों के स्पष्ट न होने से जहाँ खोले गए ११.५ करोड़ खातों में से साढ़े नौ करोड़ खाते जीरो बैलेंस पर ही टिके हुए हैं वह अवश्य ही चिंता का विषय है. सीधे पीएम से जुडी हुई योजना होने के कारण ही जहाँ सरकारी क्षेत्र के बैकों ने इसमें बढ़-चढ़ कर भाग लिया वहीं वे अपने ग्राहकों को यह बताने में असफल ही रहे कि उनके पुराने खातों को भी इस योजना में जोड़ा जा सकता है. लोगों में यह एक भ्रम ही था कि इस योजना के तहत खोले गए खातों से ही सरकारी सुविधाएँ मिलने वाली हैं जिससे बैंकों के पास अनावश्यक रूप से बोझ बढ़ा और अब इनमें से अधिकांश खातों में आज तक कोई धन जमा नहीं किया गया है जबकी योजना इन खातों के संचालित होते रहने से ही सफल होने वाली है. इस तरह से यदि देखा जाये तो जिन लोगों के पहले से खाते मौजूद थे उन्होंने ने भी नए खाते खुलवा लिए जबकि उनको इसकी आवश्यकता ही नहीं थी इससे जहाँ बैंकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ भी पड़ा है वहीं योजना अपने मूूल स्वरुप से भटक गयी लगती है.
                    जब केवल दो करोड़ खातों में निवेश करने से सरकारी बैंकों को जमा की गयी धनराशि के रूप में लगभग ९००० करोड़ रुपयों का लाभ हुआ है तो यदि इनके सही तरह से सञ्चालन पर ध्यान दिया जाता तो आज सरकार के पास लगभग ३० से ४० हज़ार करोड़ रूपये इकट्टा हो गए होते पर केवल खाते खुलवाने को प्राथमिकता देने से इस योजना से उलटी दिशा में होने वाली संभावित आय को एक तरह से रोक दिया गया है. अब इस बात की आवश्यकता है कि खुद पीएम की तरफ से अगले "मन की बात" कार्यक्रम में लोगों से इन खातों में लेन देन करने के लिए भी कहा जाये और बैंक भी अपने स्तर से इस तरह के प्रयास शुरू करें. जिन लाखों बैंक मित्रों की नियुक्ति की गयी थी अब उनको भी इस दिशा में काम करने की आवश्यकता है क्योंकि इससे ही यह योजना सही तरह से संचालित होने की तरफ बढ़ सकेगी. एक अभियान के तहत अब आधार और बैंक खातों के साथ अन्य आवश्यक पहचान पत्रों को भी इससे जोड़ा जाना चाहिए जिससे आने वाले समय में इनके माध्यम से दलाल कोई भी भुगतान प्राप्त न कर सकें. आज जो पूरे देश को ब्रॉडबैंड से जोड़ने की योजना चल रही है उसके पूरा होने से डिजिटल इंडिया के समर्थ और आर्थिक रूप से स्थित भारत का निर्माण होना ही है.       
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