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Tuesday, 3 February 2015

असुरक्षित छात्राएं और उपाय

                                                 देश में जहाँ एक तरफ लड़कियों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाने के लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर गंभीर प्रयास किये जा रहे हैं जिसका सकारात्मक प्रभाव भी दिखाई देने लगा है वहीं दूसरी तरफ उसके साथ जिस स्तर की सावधानियों की आवश्यकता है संभवतः उस तरफ अभी भी विद्यालय प्रबंधन, अभिभावकों और शिक्षकों का ध्यान ही नहीं गया है. ताज़ा घटना में जिस तरह से यूपी की राजधानी लखनऊ में केन्रीय विद्यालय के एक शिक्षक द्वारा कक्षा १२ की छात्रा का परीक्षा में फेल करने की धमकी देकर यौन शोषण किया गया और उसका गर्भपात भी कराया गया वह अपने आप में बहुत ही गंभीर मामला है क्योंकि आम तौर पर यह माना जाता है कि विद्यालयों में लड़कियां अधिक सुरक्षित रहती हैं पर इस तरह की घटनाओं से जहाँ लड़कियों को शिक्षित करने के पूरे अभियान पर ही सवालिया निशान लगने लगते हैं वहीं एक दो लोगों के कारण शिक्षक समाज और पूरे विद्यालय प्रबंधन को शर्मिंदगी उठानी पड़ती है. यह सही है कि शिक्षकों के पास लड़कियों को पढ़ाने के साथ उन पर अनुचित दबाव बनाने के बहुत सारे मौके भी होते हैं पर अब उनसे बचने के तरीकों पर विचार करने की आवश्यकता है.
                                          विद्यालयों में शिक्षकों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे केवल अपरिहार्य परिस्थितियों में ही एक्स्ट्रा क्लास आदि पर विचार करेंगें क्योंकि जब विद्यालय के सामान्य समय के अतिरिक्त ही लड़कियों को विद्यालय बुलाया जायेगा तो उनकी उस स्तर पर निगरानी नहीं की जा सकती है जिसकी उनकी उम्र को देखते हुए आवश्यकता होती है जिससे उनके लिए खतरा भी बढ़ जाता है. साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि किसी विशेष विषय के शिक्षक द्वारा प्रति वर्ष इस तरह से एक्स्ट्रा क्लास ही तो नहीं लगायी जा रही हैं जिनमें लड़कियों के लिए कोई समस्या उत्पन्न हो सकती है क्योंकि यदि शिक्षकों पर इस बात का दबाव रहेगा कि उन्हें समय के साथ अपने पाठ्यक्रम को भी पूरा करवाना है तो वे पूरे वर्ष सचेत रहेंगें. विभिन्न कारणों से एक्स्ट्रा क्लास की आवश्यकता पड़ भी सकती है तो उस परिस्थिति से निपटने के लिए क्लास का समय सही किया जाना चाहिए और विद्यालयों में उन कक्षाओं में सीसीटीवी की व्यवस्था भी होनी चाहिए जहाँ पर यह क्लास चल रही है या फिर लड़कियों को बुलाये जाने पर महिला शिक्षिकाओं की ड्यूटी भी उस दौरान लगायी जा सकती है जिससे किसी भी विपरीत परिस्थिति में समस्या को उठाने में इन लड़कियों को एक विकल्प और हौसला भी मिल सके.
                                        इस क्रम में सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की भी है कि कक्षा ८ के बाद से सभी विद्यालयों में कुछ महिला मनोवैज्ञानिकों की सलाह और उनके साथ लड़कियों के आवश्यक रूप से कुछ सेशन कराये जाएँ जिससे इन बढ़ती उम्र की लड़कियों को इस तरह के खतरों के बारे में सचेत किया जा सके और यथा संभव उनकी किसी भी समस्या का समाधान भी किया जाये. इस छोटे से प्रयास के माध्यम से जहाँ लड़कियों के आत्मविश्वास को बढ़ाया जा सकता है वहीं उनकी जानकारी के अभाव या उनको उचित फोरम न मिल पाने के कारण ही बहुत सारे मामलों में जहां उनका शोषण शुरू हो जाता है उससे भी उन्हें बचाया जा सकता है. समस्या के सामने आने पर उसके समाधान के बारे में सोचने के स्थान पर हर विद्यालय में इस तरह की समस्या से निपटने के लिए कुछ ठोस उपाय किये जाने की आवश्यकता भी है और इसके लिए चरणबद्ध तरीके से इन उपायों को शहरी क्षेत्र में तो लागू ही किया जा सकता है. ग्रामीण क्षेत्र के लिए महिलाओं के नेतृत्व में लड़कियों को जागरूक किये जाने की तरफ प्रयास करने का समय आ गया है क्योंकि जब शिक्षा के नाम पर लड़कियों की सुरक्षा ही खतरे में हो जायेगी तो पूरा अभियान असफल भी हो सकता है.
                             
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