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Thursday, 12 March 2015

कोयले की राजनीति

                                            कोयले की खदानों के आवंटन की प्रक्रिया पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए आई कैग रिपोर्ट ने जिस तरह से इस मामले में १.८६ लाख करोड़ रुपयों के राजस्व का घाटा होने का अनुमान लगाया था आज वह स्थिति स्पष्ट होने के बाद मामला साफ़ होता नज़र आ रहा है. इस मसले पर जिस तरह से शुरू से ही राजनीति की जाती रही है उसका असर पिछले वर्ष बिजली के संकट के रूप से देश के सामने आ चुका है और इस वर्ष भी सरकार के पास बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए कोई बड़ा विकल्प नहीं बचा हुआ है जिससे आम लोगों को एक बार फिर से बिजली कटौती के लिए तैयार रहना ही पड़ेगा. कोयला मामला में पहले से चली आ रही नीति के कारण जो भी समस्या खड़ी हुई है आज वह छिछली राजनीति तक पहुँच चुकी है जबकि इस मामले में कोर्ट की प्रक्रिया को तेज़ी से चलाकर निर्देश दिए जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है. एक समय जब देश के उद्योगपतियों के पास इतना धन ही नहीं होता था कि वे इतने बड़े प्रोजेक्ट्स में किसी भी तरह से हाथ डाल सकें तो सरकार के पास आवंटन के सिवाय और कोई विकल्प ही शेष नहीं था पर जिस तरह से कोयला क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ी तो उसके बाद सरकार और संसद को इस तरह अपनी ज़िम्मेदारी निभानी चाहिए थी जिससे राजस्व की इस तरह से होने वाली हानि को रोका जा सकता पर देश का राजनैतिक ढांचा इस मामले में पूरी तरह से विफल ही साबित हुआ.
                                    सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा पूर्व पीएम मनमोहन सिंह समेत छह अन्य लोगों को जिस तरह से अपराधिक मामलों के तहत सम्मन भेजे गए हैं वे भी देश की राजनैतिक और कानूनी परिस्थिति के साथ नीतिगत मुद्दों पर फैले दुर्भाव को ही अधिक दिखाती हैं. मनमोहन सिंह द्वारा जिस दृढ़ता के साथ यह कहा गया है कि वे अपनी बात कोर्ट में रखेंगें तो उससे यह स्पष्ट है कि इस मामले में कुछ भी होने वाला नहीं है क्योंकि प्रक्रियागत मामलों में कोर्ट के पास करने के लिए बहुत कुछ नहीं होता है और पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख जिन्होंने मनमोहन सिंह पर पहले भी बहुत कुछ कहा है आज यह कहने को मजबूर हो गए हैं कि हिंडाल्को मामले में कुछ भी गलत नहीं किया गया था और सब कुछ कानून के अनुरूप ही क्या गया था. इस मामले में सीबीआई कोर्ट द्वारा स्थिति को समझते हुए जो कुछ भी किया जा रहा है वह अच्छी बात है क्योंकि इसके बाद जो कुछ भी शंकाएं देश के सामने हैं वे सभी समाप्त हो जायेंगीं और यदि कोई भी व्यक्तिदोषी पाया जाता है तो उसके विरुद्ध कार्यवाही भी की जाएगी. आज सीबीआई के राजनैतिक दुरूपयोग को एक बार फिर से उसी स्तर पर देखा जा सकता है जैसा कि पूर्व में भी होता रहा है तो इससे देश की जनता के सामने नेताओं की छवि ही धूमिल होती है और राजनैतिक दलों को कुछ भी हासिल नहीं होता है.
                          हिंडाल्को मामले में ओडिसा सरकार के एक पत्र को प्राथमिकता देते हुए यदि पीएम ने सार्वजनिक क्षेत्र की एक कम्पनी के स्थान पर हिंडाल्को को प्राथमिकता दे दी तो इससे पूरे मामले में क्या गलत सन्देश चला गया ? आज पीएम मोदी देश की आर्थिक गतिविधियों को तेज़ी से आगे बढ़ाने की कोशिशों में निजी क्षेत्रों को विश्वास में लेने में लगे हुए हैं तो वे ही जानते होंगें कि कितनी समस्या सामने आ रही हैं पर जिस तरह केवल चकल्लस बाज़ी और एक दूसरे पर हमले करने के लिए ही विभिन्न नीतियों को लेकर पूर्व सरकार पर हमले किये जा रहे हैं उससे आर्थिक विकास की बातें करने के लिए कितने लोग सामने आयेंगें यह तो आने वाले समय में ही पता चल पायेगा क्योंकि आज सूचना के अधिकार के तहत जानकारी हासिल कर कोई भी किसी भी सरकार की किसी भी नीति को कटघरे में खड़ा कर सकता है. नीतियां और परिस्थितियां समय के हिसाब से सही और गलत साबित होती रहती है पर इस तरह के नीतिगत मामलों में संसद को भी अधिक ज़िम्मेदारी से काम करने की ज़रुरत है क्योंकि आक्षेप कहीं न कहीं से देश की प्रगति में ही बाधक बने हैं और आगे भी बनते ही रहने वाले हैं. अब कांग्रेस की तरफ से भाजपा पर आरोप लगाया गया है मनमोहन सिंह ने सबसे पहले २००५ में ही कोयले में नीलामी प्रक्रिया की बात की थी पर उस समय भाजपा द्वारा भारी विरोध किये जाने के कारण ही अल्पमत सरकार इस मामले पर कोई निर्णय नहीं ले पायी थी तो आज इस तरह कि नीतिगत समस्या के लिए मनमोहन सिंह पर हमलावर होकर सरकार क्या हासिल कर सकती है ?     
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