मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 8 May 2015

राष्ट्रवादियों की दोमुंही राजनीति

                                          बांग्लादेश की आज़ादी के बाद भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और उनके बांग्लादेशी समकक्ष शेख मुजीब-उर-रहमान ने १९७४ में भारत-पाक के १९४७ में हुए बंटवारे के बाद से ही विवादित क्षेत्रों की अदला बदली के लिए जो समझौता किया था उस पर भारतीय संविधान में ११९ वें संशोधन के साथ प्रक्रिया पूरी करने के लिए अनुमोदन मिल गया है. यह एक ऐसी समस्या थी जिसके चलते दोनों देशों की वे कुछ बस्तियां जो भौगोलिक कारणों से एक दूसरे के क्षेत्र में आती उनकी अदला बदली करने की आवश्यकता पर विचार किया गया था और बांग्लादेश के साथ भारत अपने अच्छे और दीर्घकालिक संबंधों को देखते हुए इस तरह के समझौते की आवश्यकता महसूस कर रहा था. २०११ में पहली बार इस मुद्दे पर संप्रग सरकार ने चरणबद्ध तरीके से काम करना शुरू किया था और संसद में इस आशय के विधेयक पर चर्चा भी शुरू हो गयी थी पर उस समय देश हित में लिए जाने वाले इस समझौते को कानूनी रूप से सही साबित करने की मनमोहन सरकार की कोशिशों पर भाजपा, तृणमूल कांग्रेस और असोम गण परिषद जैसे दलों ने पूरी तरह से केवल अपनी राजनीति चमकाने के लिए ही पानी फेर दिया था चूंकि यह विधेयक पूरी तरह से कांग्रेस के नेतृत्व में सरकार ला रही थी सिर्फ इसलिए ही इसका भाजपा ने विरोध किया था.
                                          सदन में इस विधेयक के पारित होने की गंभीरता का एहसास देश को तब हो पाया जब खुद पीएम ने सोनिया गांधी के पास जाकर सहयोग के लिए धन्यवाद दिया और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी इसके लिए मनमोहन सरकार के प्रयासों की खुलकर तारीफ की. क्या देश के नेताओं में इस तरह की सोच सदैव ही नहीं बनी रहनी चाहिए जिससे महत्वपूर्ण बिलों को पारित करने में कोई भी दल किसी भी तरह की ओछी राजनीति न कर सके ? क्या आज भाजपा और उसके मंत्री/प्रवक्ता जिस तरह से सदन के बाहर इस बिल को ऐतिहसिक बताने से नहीं चूक रहे हैं २०११ में उनको इतना ज्ञान भी नहीं था कि इस बिल की देश को कितनी आवश्यकता है ? तीस्ता जल बंटवारे पर भी कुछ इसी तरह की राजनीति देश को देखनी पड़ रही है जबकि दोनों देशों के हितों को देखते हुए इस तरह के अन्य बहुत सारे कामों को सुचारू रूप से करते रहने की आज बहुत आवश्यकता है. आज जब भाजपा सरकार में है तो उसे विपक्ष के रूप में उसके द्वारा की गयी खोखली राजनीति और देश हित की वास्तविक राजनीति में भेद समझ में आ रहा है क्योंकि पिछले एक वर्ष में देश ने मोदी सरकार को बहुत सारे वे काम आपा-धापी में करते हुए देखा है जिनको रोकने के लिए पिछली लोकसभा में वह घटिया राजनीति का प्रदर्शन करने से नहीं चूकती थी.
                                       बेशक संख्या बल पर कांग्रेस आज देश के बड़े निर्णयों को प्रभावित किये जाने की स्थिति में नहीं है फिर भी इस बिल पर उसकी नीतियों की जिस तरह से मोदी सरकार ने पुष्टि की और बांग्लादेश एक साथ हुई संधि तथा उसके महत्व को समझा उससे यही पता चलता है कि देश हित के मुद्दे पर जिस स्तर की राजनीति भाजपा द्वारा पिछले १० वर्षों में की गयी थी आज वह उसको उन्हीं मुद्दों पर बैकफुट पर धकेलने का काम करने में लगी हुई है. गनीमत है कि देश की जनता नेताओं से इस तरह के सवाल नहीं करती है कि इस समझौते के अनुपालन में हुई देरी का ज़िम्मेदार किसे ठहराया जाये वर्ना भाजपा के लिए हर सत्र में ही मुंह छिपाने लायक बहुत सारे अवसर आने ही वाले हैं ? राष्ट्रवादी सोच और देश के बारे में लम्बे चौड़े दावे करने वाली पार्टी के पास इस बिल पर करने के लिए कुछ भी नहीं था और बांग्लादेश की यात्रा में यह मुद्दा मोदी को असहज कर सकता था इसलिए इस आनन फानन में उसी स्वरुप में फिर से पारित कराने की सरकार द्वारा कोशिश की गयी जिससे अगले संसद सत्र से पहले मोदी की बांग्लादेश यात्रा पर उनके दिल से स्वागत के लिए बांग्लादेश की सरकार और जनता को तैयार किया जा सके पर कहीं बांग्लादेश की पीएम इस बात का श्रेय पिछली कांग्रेस को खुलेआम न दे दें इसलिए अपने को बचाये रखने के लिए ही खुद पीएम और सुषमा स्वराज ने इसके लिए मनमोहन और सोनिया की तारीफें कर अपने को एक तरह से अपनी राजनीति कर ही ली.      
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