मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 30 June 2015

वायदे और यथार्थ का अंतर

                                                              देश की जनता ने जिन सपनों को देखते हुए पिछले साल केंद्र में बड़ा सत्ता परिवर्तन किया था अब उसके एक साल पूरा होने के बाद जिस तरह से हर क्षेत्र में नयी बातें तो बहुत की जा रही हैं पर धरातल पर उनको किस तरह से उतारा जा रहा है यह किसी को बताया और दिखाया नहीं जा रहा है. मोदी सरकार ने जिस तरह से मेक इन इंडिया का नारा दिया और उसके बारे में विदेशों तक में खूब प्रचार प्रसार भी किया उसके बाद क्या इस क्षेत्र में कुछ होना शुरू हुआ यह अभी तक किसी को स्पष्ट रूप से नहीं मालूम है और केवल सरकार अपनी तरफ से प्रेस विज्ञप्ति जारी कर आंकड़ों को बताती रहती है जो विश्लेषकों की नज़रों में संदिग्ध ही लगते हैं और आने वाले समय में जनता को भी इनकी सच्चाई का पता चलना शुरू हो जायेगा. रक्षा क्षेत्र में जिस तरह से मेक इन इंडिया की नयी परिभाषा बताई जा रही थी और अब जो सच सामने आया है उससे तो यही लगता है कि सरकार अपने मेक इन इंडिया के लिए संभवतः देश के मौजूदा ढांचे को तबाह कर उन्हें विदेशी कम्पनियों के साथ साझा उपक्रम बनाने के लिए बाध्य करना चाहती है क्योंकि ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड (ओएफबी) की चेतावनी से कुछ ऐसा ही लगता है कि मोदी सरकार देशी-विदेशी उद्योगपतियों या समूहों के हाथों में खेल रही है.
                                                       यदि बयान, आंकड़ों और यथार्थ के बीच तुलना की जाये तो मोदी सरकार का यह रुख सामने आ जाता है ओएफबी ने बजट की कटौती के चलते अपनी ४१ इकाइयों से जिस तरह उत्पादन पर २२७१ करोड़ रुपयों का असर पडने की आशंका जताई है वह देश के लिए चिंता की बात है क्योंकि देश की सेना, अर्ध सैनिक बलों राज्यों की पुलिस के लिए विभिन्न तरह के हथियार और गोला बारूद का निर्माण करने वाली इस कम्पनी के बजट को २६३० करोड़ रुपयों के स्थान पर केवल ११४३ करोड़ रूपये ही दिए गए हैं. इस समय बोर्ड की बहुत सारी परियोजनाएं भी चल रही हैं जिन पर सरकार की इस कटौती का सीधे ही बुरा असर पड़ने वाला है क्योंकि बजट में कमी के चलते जहाँ अब विभिन्न तरह के आधुनिकीकरण पर रोक लग जाएगी वहीं उत्पादन पर भी बुरा असर पड़ सकता है. क्या सरकार की तरफ से मेक इन इंडिया पर जितना ज़ोर दिया जा रहा है वह देश के मौजूदा ढांचे को ख़त्म करने के बाद ही शुरू किया जा सकता है या विदेशी कम्पनियों के भारत में आने और निर्माण करने के लिए देश की सफल कम्पनियों को और भी प्रतिस्पर्धी बनाये जाने की आवश्यकता भी है ? निश्चित तौर पर इस बारे में सरकार की कोई सोच तो होगी ही पर आने वाले समय में कहीं भारत अंगेज़ों के समय में न लौट जाये जब हर तरह के उत्पादन पर विदेशी कम्पनियों का ही नियंत्रण हुआ करता था ?
                                   ओएफबी के पास कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं भी हैं जिनके चलते रहने के लिए सरकार को इस क्षेत्र में अनुसन्धान के लिए और अधिक धन आवंटित करने की आवश्यकता है पर पता नहीं क्यों सरकार अभी से ही इन कम्पनियों को कम धनराशि आवंटित कर इन्हें समस्या में डालना चाहती है ? भारत में विश्व स्तरीय उत्पादन हो और हम किसी भी तरह से चीन का विकल्प न बन जाएँ जिस पर सस्ते और कम गुणवत्ता के माल का ठप्पा लगा हुआ है इससे निपटने के लिए सरकार को अब सही दिशा में काम करने की आवश्यकता भी है. यह बोर्ड रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आता है तो इसके भविष्य के बारे में सरकार को ही सोचना होगा. ओएफबी के पास रक्षा मंत्रालय के सात महत्वपूर्ण परियोजनाएं चल रही हैं जिनमें पहले ही काफी विलंब हो चुका है अब इनमें और देरी हो सकती है इनमें ५० टी-७२ टैंकों का निर्माण, ७५० एवी इंजनों का निर्माण, टी-७२ एवं टी-९० टैंकों के लिए पार्ट्स का निर्माण का कार्य मार्च २०१३ में पूरा होना था लेकिन अभी भी यह लटका पड़ा है. इसी प्रकार ९७१ करोड़ की लागत से १४० टी-९० टैंकों के निर्माण की परियोजना में भी और विलंब हो सकता है इसे मार्च २०१४ तक पूरा होना था लेकिन अब कब पूरी होगी कि यह किसी को पता नहीं है. इसी प्रकार १०५ आकाश बूस्टर सस्टेनर, ३०० लार्ज कैलीवर वैपन का निर्माण मार्च २०१५ तक होना था लेकिन अब दिसंबर २०१६ की तिथि रखी गई है। पिनाक मिसाइल के रूप में एक अन्य महत्वपूर्ण परियोजना जिसमें १०००-५००० पिनाक मिसाइलों का निर्माण अक्टूबर २०१५ तक होना था, वह भी देरी से चल रही है और लक्ष्य की तिथि को एक साल तक बढ़ा दिया गया है लेकिन बजट की कमी यहां भी आड़े आ रही है.
                                                      अब सरकार के लिए यह महत्वपूर्ण होना चाहिए कि वह मेक इन इंडिया पर पूरा ज़ोर देते हुए अपने इन स्वदेशी प्रतिष्ठानों को और भी मज़बूत करने के बारे में सोचे क्योंकि आने वाले समय में कोई नहीं बता सकता है कि अपने पड़ोस में चल रही विभिन्न तरह की गतिविधियों में किस तरह का मोड़ आ जायेगा और सरकार को कौन से कदम उठाने पड़ सकते हैं ? घरेलू परिस्थितियों के विपरीत होने पर अपने को मज़बूत साबित करने के लिए मोदी भी परमाणु क्षेत्र में अटल की तरह नए परीक्षणों या अन्य गतिविधियों पर ज़ोर देना भी शुरू कर सकते हैं और उस स्थिति में देश को निश्चित तौर पर एक बार फिर से आर्थिक प्रतिबन्ध भी झेलने पड़ सकते हैं. जब हमारे देश में हर क्षेत्र में विदेशी कम्पनियों का दखल और भी अधिक हो जायेगा तो आने वाले समय में किसी प्रतिबन्ध के समय देश कि प्रगति पर क्या असर पड़ेगा इस पर भी विचार करने की ज़रुरत है.
                         रक्षा क्षेत्र में एक स्थायी नीति के बनाने के बारे में सरकार को अभी से सोचना शुरू करना चाहिए जिससे आने वाले समय में देश किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार रह सके. देश का बड़ा बाज़ार और सस्ता श्रम आज भी पूरी दुनिया को अपनी तरफ खींचने में सक्षम है तो इस स्थिति में का लाभ अन्य क्षेत्रों में उठाने से परहेज़ नहीं करना चाहिए पर किसी भी विपरीत परिस्थिति के लिए अपने रक्षा उत्पादन को अधिकतम स्वदेशी हाथों में रखने की नीति लम्बे समय में लाभकारी हो सकती है. १९९८ के परमाणु परीक्षण के बाद रूस से क्रायोजेनिक इंजन तकनीक के हस्तांतरण पर विपरीत असर पड़ा था और हमारी मिसाइल और अंतरिक्ष कार्यक्रमों पर एक तरह से पूरी रोक ही लग गयी थी और उसका दुष्परिणाम देश की अंतरिक्ष वैज्ञानिक बिरादरी ने अच्छे से झेला भी था. सरकार को सामरिक क्षेत्रों में अपने देश के संस्थानों की पूरी मदद करने की पुरानी नीति पर कुछ संशोधनों के साथ आगे बढ़ना चाहिए पर इस क्षेत्र को विदेशी कम्पनियों के हवाले करना देश के हितों के साथ खुला समझौता ही हो जायेगा.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

No comments:

Post a Comment