मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 27 July 2015

शिक्षित युवक आतंकी राह पर

                                                              पिछले वर्ष में तरह से कश्मीर घाटी में आतंकी घटनाओं की प्रकृति में अंतर आना शुरू हुआ है उससे देश के सुरक्षा बलों को भी आतंकियों के प्रभाव वाले क्षेत्रों में अपनी सोच और रणनीति को बदलने के बारे में विचार करना पड़ रहा है. सीमा पार से घुसपैठ पर लगभग पूरा विराम लगने के बाद एक वर्ष में पाक समर्थित आतंकियों के स्थान पर अब कश्मीरी युवकों ने एक बार फिर से चरमपंथ की तरफ कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं और इसमें सबसे चिंताजनक बात यह सामने आ रही है कि अब उच्च शिक्षित युवक भी आतंकियों के साथ जाने लगे हैं जबकि अभी तक ऐसा कोई ट्रेंड घाटी में दिखाई नहीं देता था. अधिकांश स्थानीय युवक किसी विद्रोह या गरीबी के कारण ही चरमपंथियों के साथ हुआ करते थे पर बदली हुई परिस्थिति में वहां काफी कुछ परिवर्तित होने लगा है. पूरी दुनिया में आतंक का सबसे नया और खूंखार चेहरा बनकर उभरने वाला आईएस भी कश्मीर में अपने पैर पसारने की कोशिश में लगा हुआ है तथा जिस तरह से कुछ युवकों द्वारा पिछले कई हफ़्तों से पाक से साथ आईएस के झंडों को भी घाटी में लहराया जा रहा है वह सुरक्षा बलों के लिए नयी चुनौती बन चुका है.
                                 आज पूरी दुनिया में सोशल मीडिया के बढ़ते हुए प्रचार के साथ जिस तरह से पढ़े लिखे मुस्लिम युवक/ युवतियों का रुझान आईएस की तरफ हो रहा है उस पर देश को अभी से गंभीर चिंतन करने की आवश्यकता भी है क्योंकि आज भी कश्मीर घाटी में भारतीय सुरक्षा बलों के साये में रहने वाले कश्मीरी अलगाववादी नेता भारतीय संविधान का विरोध किया करते हैं उसके लिए हर स्तर पर सोचने की ज़रुरत सामने आ चुकी है. देश और घाटी के माहौल में आखिर ऐसा क्या बदलाव हो रहा है जिससे कम स्तर पर ही सक्रिय चरमपंथियों को और भी अधिक युवकों को अपने साथ जोड़ने में सफलता कैसे मिल रही है ? आज यह सवाल सबसे बड़ा हो चुका है क्योंकि शिक्षित युवक यदि इस तरह से अपनी राह बदल रहे हैं तो यह घाटी के साथ पूरे देश के लिए चिंताजनक भी है क्योंकि आने वाले समय में इनके द्वारा घाटी के आलावा पूरे देश में आतंकी घटनाओं को करने की कोशिशें भी की जा सकती हैं और उस परिस्थिति में सरकार के सामने नयी चुनौतियाँ ही आने वाली हैं. युवकों के भटकाव के कारणों पर अब नए सिरे से सोचने का समय आ गया है और उसके माध्यम से ही कुछ सही नीति बनाई जा सकती है.
                                 घाटी में मुफ़्ती सरकार के होने से आतंकियों को ऐसा लगने लगता है कि सरकार उनके प्रति नरम रुख ही अपनाने वाली है पर वे यह भूल जाते हैं कि सरकार की भी अपनी सीमायें हैं और वह उनसे आगे बढ़कर नहीं सोच सकती है. इस बारे में सेना का कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने भी अपनी चिंताएं जताई हैं और एनएसए अजित डोभाल का घाटी का दौरा भी इसी सिलसिले में किया गया बताया जा रहा है. आखिर सरकार किस तरह से इन युवकों को आतंकी समूहों के चंगुल में जाने से रोक सकती है आज यही गंभीर चिंता का विषय बना है क्योंकि इन युवकों को घाटी की मुख्य धारा में रोके रखना ही सबसे बड़ी चुनौती हो चुका है. सरकार और सेना में इस बात को लेकर सहमति भी है कि शिक्षण संस्थाओं में युवकों को काउंसिलिंग के माध्यम से समाज के साथ चलने और समाज के खिलाफ जाने के प्रभावों/ दुष्प्रभावों को समझाने की कोशिशें की जानी चाहिए क्योंकि जब तक सरकार के पास इन युवकों से सीधे संपर्क करने और उनके लिए सही गलत राह दिखाने की सटीक व्यवस्था नहीं होती है तब तक स्थितियों को पूरी तरह से सुधारा नहीं जा सकता है. केवल सतही प्रयासों से इस देश को सुरक्षित रखने के प्रयास सफल नहीं हो सकते हैं इसलिए अब इस मुद्दे पर केंद्र और मुफ़्ती सरकार को मिलकर काम करना ही होगा.
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