मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 9 September 2015

वैश्विक आर्थिक परिदृश्य और मोदी की सीख

                               पिछले दो दशकों से पूरे विश्व की आर्थिक प्रगति का इंजन बना चीन अचानक से ही सुस्ती का शिकार होता दिखाई दे रहा है वह भारत जैसे विकासशील देशों के लिए भी बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ सकता है. इस समस्या को समझते हुए खुद पीएम मोदी की तरफ से उद्योग जगत के साथ एक साझा सम्मलेन में जिस तरह की बातें कही गयीं वे काफी हद तक तकनीकी तौर पर सही भी हैं पर जिस तरह से देश दुनिया के उद्योगपति केवल अपने लाभ के लिए ही काम करते रहते हैं और अधिकांश देश के विकास में उस तरह से निवेश करने की हिम्मत और इच्छाशक्ति नहीं दिखा पाते हैं जिसके आवश्यकता होती है तो उस परिस्थिति में सरकार के पास कितने विकल्प शेष बचते हैं ? पिछले देश के युवाओं को अच्छे भविष्य के सपने दिखा कर सत्ता में आये मोदी के लिए अब उस वायदे को पूरा करना बड़ा सरदर्द साबित होने वाला है क्योंकि उन्होंने गुजरात मॉडल के अनुसार पूरे देश को चलाने की जो कोशिश की थी वह पूरी तरह से विफल हो चुकी है तथा अपनी सरकार के पहले वर्ष में कल्याणकारी योजनाओं और अन्य परियोजनाओं में सरकारी भागीदारी के स्थान पर निजी निवेश को बढ़ावा देने की नीति पर अब फिर से मोदी को सोचकर बदलाव करने को मजबूर होना पड़ा है.
                               आज देश के सामने सुस्त पड़ी आर्थिक गतिविधियों को फिर से तेज़ करने के लिए जिन प्रयासों की आवश्यकता है संभवतः मोदी सरकार उसे पहचान भी नहीं पा रही है खुले तौर पर चीन की आर्थिक गतिविधियों के सुस्त होने का लाभ उठाने की बात वैसे तो सही लगती है पर इस वर्ष जिस तरह से देश के अधिकांश हिस्सों में असमय वर्षा और सूखे के कारण जो परिस्थितियां बन गयी हैं उनसे निपटने के लिए सरकार का फोकस ठीक नहीं लग रहा है. जब गांवों के लोगों के पास क्रय शक्ति ही नहीं है तो निजी निवेशक आखिर वहां क्यों जाना चाहेगा यह बता पाना मोदी और जेटली के लिए असंभव सा है या फिर वे जानते हुए केवल बयानबाज़ी से ही काम लेना चाहते हैं और आने वाले समय में सरकारी खर्चे के मुकाबले निजी क्षेत्र से देश के कृषि क्षेत्र में निवेश न होने की आशंका उन्हें भी है जिसके वे खुलकर स्वीकारना नहीं चाहते हैं क्योंकि उससे निजी निवेशकों के सरकार से संबंधों पर बुरा असर पड़ सकता है. आज जब मोदी के पास मज़बूत आधारभूत तत्वों से लैस भारतीय अर्थ व्यवस्था है तो वे उसका उपयोग सही दिशा में क्यों नहीं करना चाहते हैं यह सभी की समझ से बाहर है क्योंकि वे आज भी देश की अपने दम पर किये गए विकास के स्थान पर विदेशों से मिलने वाली सहायता के माध्यम से काम करने में विश्वास करने वाले अधिक लगते हैं.
                              पिछले वर्ष आम चुनावों में मोदी और भाजपा खुलेतौर पर मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम पर देश की अर्थ व्यवस्था को गड्ढे में डालने के आरोप लगाया करते थे पर आज वे निजी उद्योगों के साथ अपनी बातचीत में जेटली के साथ यह बहुत ही आराम से स्वीकार कर लेते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था के आधारभूत तत्व बहुत ही मज़बूत हैं ? क्या मोदी को आर्थिक मामलों की समझ भी है या वे इसका भी दोहन अपने बयानों में आवश्यकतानुसार करते रहते हैं और क्या जेटली के रूप में देश के पास उतना सशक्त वित्त मंत्री है जो देश के लिए आर्थिक प्रगति के मामलों पर राजनीति से हटकर कठोर निर्णय लेने की क्षमता से युक्त है ? इन सब सवालों का जवाब खुद एक साल में मोदी ने अपनी नीतियों में परिवर्तन करके दे ही दिया है कि राजनैतिक तौर पर भले ही उन्होंने ने कांग्रेस और मनमोहन सिंह को मात दे दी हो पर आर्थिक रूप से वे मनमोहन सिंह की सोच के सामने कहीं भी नहीं टिक सकते हैं जिन्होंने २००८ की वैश्विक मंदी के दौर में भी देश को बड़े हिचकोलों से बचा लिया था जबकि अन्य बहुत सारे देश आज भी उसके झटकों को महसूस कर रहे हैं. अच्छा हो कि नीतियां सम्मेलनों में किये जाने वाले कोरे आह्वाहनों से आगे बढ़ें और देश को विकास के सही पथ पर आगे बढ़ाने का काम कर सकें.   
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