मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 9 September 2015

लैंड बिल की वापसी

                                                  संसद में लम्बे गतिरोध और राज्य सरकारों की तरफ से भी तेज़ी और उत्साह न दिखाए जाने के चलते जिस तरह से खुद पीएम ने अत्यधिक विवादित हो चुके लैंड बिल को वापस लेने की बात कही वह लोकतंत्र की ताकत ही कही जा सकती है. इस मसले को अब राजनैतिक रूप दिया जाना कहीं से भी उचित नहीं है भले ही उसमें कांग्रेस या भाजपा ही क्यों न शामिल हों क्योंकि सरकार के लाख प्रयासों के बाद भी देश की राजनीति में कमज़ोर पड़ चुकी कांग्रेस ने इस लैंड बिल के ज़रिये ही सरकार के लिए अच्छी खासी मुसीबतें खड़ी करने में सफलता पायी है. आज बिहार के चुनाव महत्वपूर्ण हैं संभवतः इसलिए भी सरकार ने इस बिल को फिलहाल वापस लेने की आधिकारिक घोषणा भी कर दी है क्योंकि जिस तरह से गरीबी को झेल रहे और उससे बाहर निकलने की कोशिशों में लगे हुए बिहार के लोगों पर लैंड बिल का असर हो सकता है यह बात भाजपा के रणनीतिकारों को अच्छी तरह से पता भी है इसलिए वे इस महत्वपूर्ण चुनाव से पहले कोई भी खतरा बढ़ाने की तरफ नहीं जाना चाहते हैं. बिहार चुनाव के बाद क्या स्थितियां बनने वाली हैं यह तो चुनाव के बाद ही पता चल पायेगा पर पूर्ण बहुमत की मोदी सरकार ने जिस तरह से लोकतंत्र का सम्मान करते हुए यह कदम उठाया है वह निश्चित तौर पर अच्छा ही है.
                                           कोई भी कानून सदैव ही अच्छा नहीं रह सकता है और यह भी संभव है कि २०१३ के संप्रग के लैंड बिल में भी काफी कमियां हों पर जिस तरह से मोदी सरकार ने अपने ज़िद दिखाते हुए उसे बार बार अध्यादेशों के सहारे ज़िंदा रखने की कोशिशें की उसका लाभ कांग्रेस ने अवश्य उठाया. संसद में सभी दलों के पास नियमित तौर पर मौके होते हैं कि वे देश और अपने दलों की राजनीति के अनुसार कानूनों में परिवर्तन कर सकें पर यह परिवर्तन केवल बहुमत के ज़ोर पर भी नहीं होना चाहिए. मोदी सरकार के पास अभी भी काफी समय है और २०१३ के बिल के चलते जो ज़मीनी दिक्कतें सामने आ रही हैं आज केंद्र सरकार को राज्य सरकारों और उद्योग जगत से उनके बारे में जानकारी जुटानी चाहिए जिससे आने वाले समय में वह इस बिल की कमियों को संसद और जनता के सामने रख सके तथा उनके समाधान के साथ भी सामने आने की कोशिश करे जिससे विपक्षी दलों को सरकार पर आक्षेप लगाने के अवसर न मिल सकें. एक समय लैंड बिल को अपनी प्रतिष्ठा बना चुकी सरकार ने जिस ख़ामोशी के साथ इसे अपने आप समाप्त हो जाने के बारे में सोचा है उससे सरकार की कठिनाइयों के बारे में भी पता चलता है. खुद संघ परिवार के संगठनों की तरफ से भी इस बिल का विरोध किया जा रहा था और स्वदेशी की अलख जगाने वाले स्वामी रामदेव से लगाकर स्वदेशी जागरण मंच तक सरकार की इस तरह की कोशिशों से खुद को अजीब स्थिति में पा रहे थे क्योंकि एक समय वे संप्रग सरकार पर उद्योगपतियों के हितों का रक्षण करने के आरोप लगाया करते थे पर अब मोदी सरकार या खुद मोदी ने जिस तरह से इन लैंड बिल पर सभी को अनसुना कर दिया था वह उनके लिए भी कठिन समय ही लाने वाला था.
                                    लैंड बिल पर खुद मोदी ने जिस तरह से पहल की है वैसे ही अन्य विवादित मामलों में उन्हें विपक्ष को साथ में लेकर सुलझाने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि मोदी के मंत्रियों में अधिकांश जिस तरह से बात करते हैं वह समस्या को सुलझाने के स्थान पर उलझाने का ही अधिक काम करती है तो इस परिस्थिति में खुद पीएम को पहल करते हुए सीधे विपक्षी दलों के नेताओं के साथ स्वयं ही बैठकें करनी चाहिए क्योंकि वही एकमात्र रास्ता है जिसमें बयानबाज़ी की गुंजाईश पूरी तरह से खत्म की जा सकती है क्योंकि मामला शीर्ष स्तर पर ही चलने से उसमें भ्रम की स्थिति नहीं उत्पन्न होने पाती है. अभी तक खुद मोदी की तरफ से कभी भी ऐसा प्रदर्शित नहीं किया गया है कि वे विपक्षी दलों के साथ संसद में बेहतर तालमेल चाहते हैं जिसका सीधा असर उनके अनुभवहीन मंत्रियों के माध्यम से सरकार की आवश्यक गतिविधियों पर भी पड़ रहा है क्योंकि जिस तरह से खुद पीएम चुनावी रैलियों में आक्रमण की सारी सीमायें भूल जाते हैं तो उसके बाद उनके मंत्रियों और पार्टी के नेताओं में भी उसी तरह से बोलने की होड़ लग जाती है. अब खुद पीएम को पहल कर इस तरह के हमले करने की नीति पर विचार करने के बारे में सोचना ही चाहिए जिससे राजनैतिक मतभेद विद्वेष के रूप में न दिखाई देने लगे. भले ही सरकार ने किसी भी परिस्थिति में इस कदम को उठाया हो पर यह संसद से सड़क तक की राजनीति में एक नया मोड़ भी साबित हो सकता है इस परिस्थिति का लाभ विपक्षियों और सरकार को नहीं उठाना चाहिए क्योंकि देश के आगे बढ़ने से जुड़े हुए मुद्दों पर इस तरह से की जाने वाली राजनीति कभी भी अच्छी नहीं हो सकती है. अभी तक के बयानों को देखते हुए ऐसा नहीं लगता है कि सरकार इस तरह के सभी मामलों को अब आगे बढ़कर सुलझाना भी चाहती है क्योंकि भले ही वह स्वीकार न करे पर कांग्रेस द्वारा उसे किसान विरोधी साबित किये जाने की कोशिश लैंड बिल से काफी हद तक सफल होती दिखने पर ही मोदी ने इस तरह का कदम उठाने पर विचार किया है. अब राजनीति को किनारे करते हुए देशहित के मुद्दों पर सरकार को नए सिरे से सोचते हुए आगे बढ़ने के बारे में सोचना चाहिए और महत्वपूर्ण मसलों पर सीधे विधेयक लाने की प्रवृत्ति से बचने के स्थान पर पहले अनौपचारिक और औपचारिक रूप से इस पर संसद के बाहर भी एक सहमति का माहौल बनाने के बारे में सोचना चाहिए जिससे देश के लिए सही नीतियां बनाने में संसद सफल हो सके.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

No comments:

Post a Comment