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Sunday, 22 November 2015

स्मार्ट सिटी की राजनीति

                                                   यूपी और केंद्र के बीच जिस तरह से नए सियासी दांव-पेंच चलते ही रहते हैं लगता है कि इस सूची में अब विकास को भी जोड़ दिया गया है और देश को विकास की आधुनिक अवधारणा के साथ आगे बढ़ाने की कोशिशों में लगी हुई मोदी सरकार के साथ यूपी सरकार ने भी स्मार्ट सिटी के मुद्दे पर राजनीति करने का मन बना लिया है. स्मार्ट सिटी के चयन को लेकर जिस स्तर का विवाद मेरठ और रायबरेली के मध्य दिखाई दिया और उसके साथ ही केंद्र और प्रदेश सरकार की तरफ से इस मुद्दे पर अजीब तरह का बर्ताव किया जा रहा है वह किसी की भी समझ से पर है. देश की सबसे बड़ी आबादी को अपने में समेटे यूपी के साथ इस तरह का व्यवहार किया जाना कहाँ तक उचित कहा जा सकता है वह भी तब जब पूरे यूपी का संसद में प्रतिनिधित्व पीएम के नेतृत्व में भाजपा के पास ही पहुंचा हुआ है. शहरों के विकास के साथ जनता का जुड़ाव भी अधिक महत्वपूर्ण हुआ करता है क्योंकि जब जब जनता ने खुद को राज्यों की सत्ता से दूर महसूस किया तब तब राज्यों में बड़े स्तर पर संघर्ष हुए हैं जिनके बाद राज्यों के बंटवारे तक की भी नौबत आई है.
                                                 यदि स्मार्ट सिटी की अवधारणा को आगे बढ़ाना था तो पूरे देश में यूपी की अहमियत देखते हुए क्या और अधिक शहरों के लिए इस योजना को आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए था ? निश्चित तौर पर इस चयन की पूरी प्रक्रिया में मनमानी की गयी है और कहीं न कहीं कुछ ऐसा भी है जो राजनीति को प्रेरित कर रहा है. रायबरेली जैसा पिछड़ा जिला अगर आज स्मार्ट सिटी की दौड़ में है तो निश्चित तौर पर इसका श्रेय गांधी परिवार को ही जाता है जिसने इस जिले में भी राष्ट्रीय स्तर के संस्थान खोलने के बारे में सोचना शुरू किया और आज वहां पर बहुत कुछ है पर कांग्रेस के लम्बे समय तक सत्ता में रहने के बाद आज भी रायबरेली को पूरी तरह से विकसित भी नहीं कहा जा सकता है. मेरठ अपने आप में ऐतिहासिक और प्राचीन शहर होने के साथ पश्चिमी उप्र का महत्वपूर्ण शहर भी है एक समय जब प्रदेश में हरित प्रदेश की मांग की जा रही थी तब मेरठ को उसकी राजधानी माना जा रहा था पर आज स्थिति यह बन चुकी है कि मेरठ को रायबरेली के साथ स्मार्ट सिटी के लिए प्रतिस्पर्धा करने के साथ देश में मोदी सरकार की आधुनिक शहरों की इस नयी अवधारणा से बाहर ही रखा जा रहा है ? यह तब भी है जब मेरठ से भाजपा के ही सांसद और उप्र के भाजपा अध्यक्ष भी हैं तो क्या यह माना जाये कि स्मार्ट सिटी की यह अवधारणा भी केवल राजनैतिक जुमलेबाजी से अधिक कुछ भी नहीं है ?
                                            मेरठ अपने आप में किसी भी परिचय का मोहताज़ नहीं है और यदि किसी शहर को स्मार्ट बनाना है उप्र में बिना मेरठ के कोई बात ही नहीं बन सकती है पर दुर्भाग्य से आज यह सब कुछ इस तरह से किया जा रहा है कि विकास पर राजनीति हावी होती दिख रही है. आबादी और विकास के साथ जुड़ने के बाद जितने बड़े पैमाने पर मेरठ रोज़गार उपलब्ध करवाने में सक्षम है रायबरेली उसके मुकाबले कहीं भी नहीं टिकता है क्योंकि वहां पर सरकार ने कोशिश करके इतने प्रयास किये हैं जबकि मेरठ शुरू से ही अपने आप में सब कुछ समाहित किये हुए हैं और केवल सरकारों को इस बारे में सही सोच के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता ही है. जिस तरह से यूपी सरकार ने एकदम से मेरठ और रायबरेली को इस सूची से बाहर कर दिया है उससे केवल यही लगता है कि उसने इतनी महत्वपूर्ण परियोजना से प्रदेश की एक बहुत बड़ी आबादी को ही वंचित कर दिया है. इन शहरों को स्मार्ट सिटी के लायक मानने के जो भी मानक बनाये गए हैं यदि मेरठ उनमें खरा नहीं उतरता है तो निश्चित तौर पर यह नियमों की खामी ही है क्योंकि उप्र के इतने महत्वपूर्ण शहर को इतने बड़े कार्यक्रम से बाहर रखने की मंशा पर संदेह तो होता ही है अब वह केंद्र या राज्य चाहे जिसके स्तर पर किया जा रहा हो.
                                       यदि कहीं से अपनी राजनैतिक सूझबूझ या मजबूरी के चलते मुलायम अखिलेश को यह लगता है कि सोनिया गांधी से सीधे तौर पर इस तरह से टक्कर लेना उचित नहीं है तो उनको इस मुद्दे पर फिर से विचार करने की आवश्यकता थी क्योंकि मेरठ को प्राथमिकता देने की स्थिति में सीधे सोनिया गांधी से रायबरेली के इसी तर्ज़ पर विकास के बारे में अन्य योजनाएं शुरू की जा सकती थीं. इस मामले में केंद्र ने जहाँ अपनी तरफ से पहले आरोप लगाया कि सोनिया का क्षेत्र होने के कारण प्रदेश सरकार मेरठ पर रायबरेली को प्राथमिकता दे रही है वहीं फिर बाद में उप्र के कोटे के शहरों की सूची को १४ में परिवर्तित कर दिया क्योंकि मोदी सरकार भी जानती है कि लोकसभा में भले ही कोई परिस्थिति हो पर राज्यसभा में महत्वपूर्ण बिलों को पास करवाने के लिए उसे सदैव ही कांग्रेस के समर्थन की आवश्यकता पड़ती रह सकती है. अच्छा होता कि अखिलेश खुद इस मामले पर पहल करते और इन दोनों ही शहरों को चयनित करने के बारे में प्रस्ताव तैयार करने की कोशिश करते पर आज उनकी राजनैतिक सूझ बूझ इस पूरे विकास के पैमाने पर कमज़ोर ही दिख रही है जिसका अन्तिम रूप से जनता को ही बुरा परिणाम भोगना पड़ेगा.
                                       विकास के महत्वपूर्ण मुद्दों पर इस तरह के सरकारी रुख क्या देश को सही मायने में आगे बढ़ाने के लिए होते है या इनके माध्यम से राजनैतिक दल और नेता अपने हितों को ही साधने का काम किया करते हैं ? विकास के लम्बे चौड़े मुद्दे को केन्द्र में रखकर मोदी ने सत्ता संभाली थी पर आज जिस तरह से वे केवल रायबरेली के मुद्दे पर मेरठ के साथ अन्याय होते हुए देख रहे हैं आने वाले समय में उन्हें भी इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है. मेरठ जाटों और अजीत सिंह का गढ़ रहा है और वहां पर सपा के लिए बहुत कुछ दांव पर कभी भी नहीं रहा करता है पर २०१७ के विधान सभा चुनावों के लिए हर तरह की तैयारियों में लगी हुई भाजपा के लिए क्या मेरठ को स्मार्ट सिटी से बाहर करने के उप्र सरकार के इस ताज़े प्रयास के बाद आशा की किरणे भी दिखाई देने वाली हैं ? मेरठ अपने विकास में सक्षम है और एक तरफ जहाँ राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली पर दबाव कम करने की योजनाएं बन रही हैं वहीं दिल्ली से सटे हुए मेरठ को विकास की इस पूरी प्रक्रिया से बाहर रखना क्या परदे के पीछे की किसी और कहानी की तरफ इशारा नहीं करती है ? फिलहाल उप्र के आम नागरिक को इस बात से कोई मतलब नहीं है पर स्मार्ट सिटी की लिस्ट में मेरठ का नाम न दिखाई देना विकास के दावों को अवश्य ही खोखला साबित कर देता है.        
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