मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 16 December 2015

नामकरण की राजनीति

                                 लगता है कि सत्ता की चौखटें लांघने के बाद सभी नेता सत्ता के स्थायी भाव के अनुरूप ही सोचने लगते हैं क्योंकि अभी तक देश के महत्वपूर्ण संस्थानों के नामकरण को लेकर कांग्रेस पर हमलावर रहने वाली भाजपा ने भी उसी तरह का व्यवहार करना शुरू कर दिया है जैसा कि कभी उसकी तरफ से आरोप हुआ करता था. ताज़ा मामले में चंडीगड़ हवाई अड्डे के नामकरण से जुड़े हुए मुद्दे पर पंजाब और हरियाणा सरकार के फैसलों के बाद बड़ा विरोध शुरू हो गया है क्योंकि इस हवाई अड्डे का नाम क्रांतिकारी अमर शहीद भगत सिंह के नाम पर रखे जाने का प्रस्ताव चल रहा था जिसे खुद हरियाणा के उड्डयन मंत्रालय का प्रभार सँभालने वाले मंत्री राम विलास शर्मा ने भी स्वीकार किया है पर अचानक से इसके नामकरण के लिए संघ और भाजपा के नेता १९७७ से १९७९ तक हरियाणा के डिप्टी सीएम रहे मंगल सेन का नाम प्रस्तावित कर दिया गया है जिसके बाद भगत सिंह से जुड़े हुए संस्थानों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है. केंद्र सरकार के पास पंजाब और हरियाणा की तरफ से प्रस्ताव जाने के बाद इसका नाम बदलने में कोई तकनीकी समस्या तो नहीं आने वाली है और अब इतने विरोध के बाद क्या यह बदला भी जा सकता है यही देखने का विषय होगा.
                                 यह सही है कि लम्बे समय तक देश पर राज करने वाली कांग्रेस ने अपने चंद नेताओं के नाम पर ही देश के महत्वपूर्ण संस्थानों के नामकरण को सदैव ही प्राथमिकता दी है और समय समय पर अन्य दलों की तरफ से सरकारों को प्रस्ताव मिलने पर नाम बदले भी जाते रहे हैं जैसे यूपी के लखनऊ हवाई अड्डे को चौ० चरण सिंह के नाम पर जाना जाता है जबकि यूपी से अन्य बहुत सारे लोग भी उनसे पहले और बाद में हुए जिनके नाम पर यह किया जा सकता था पर जब उनके नाम पर सर्वसम्मति हो गई तो किसी भी विवाद की गुंजाईश ही नहीं रह गयी. आज इस तरह का विवाद सामने आने पर क्या केंद्र सरकार इस तरह से नाम परिवर्तन करने की हिम्मत दिखा पायेगी इस पर अब सभी को सन्देह भी है क्योंकि भगत सिंह की उपेक्षा का आरोप लगाने वाली भाजपा जनता को तब जवाब देने की स्थिति में नहीं होगी जब उससे यह सवाल पूछा जायेगा कि क्या मंगल सेन को भगत सिंह के सामने प्राथमिकता दी जानी चाहिए थी ? यह ऐसी स्थिति होगी कि उसका कोई भी उत्तर देने के लिए भाजपा या संघ में कोई भी तैयार नहीं होगा.
                               यदि ऐसा कोई मामला बनता था तो चेन्नई हवाई अड्डे की तर्ज़ पर यह के हवाई अड्डे का नाम भगत सिंह के नाम पर किया जा सकता है और इसके घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय टर्मिनलों को हरियाणा और पंजाब के किसी भी नेता के नाम पर रखा जा सकता है वहां पर के कामराज और सी इन अन्नादुराई के नाम पर घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय टर्मिनलों के नाम रखे गए हैं. क्या नेताजी और अन्य क्रांतिकारियों के मामले में कांग्रेस पर हमलावर रहने वाली भाजपा भगत सिंह के भतीजे प्रोफेसर जगमोहन सिंह की इस बात का जवाब दे पायेंगें कि इस कदम से भाजपा की संकीर्ण सोच का ही पता चलता है ? खट्टर, बादल सरकार पर भी इस बात का दबाव बनने ही वाला है कि आखिर वे किस तरह से भगत सिंह के स्थान पर किसी अन्य के नाम पर इस तरह से सहमत हो सकते हैं और यह जनता के बीच बड़े मुद्दे के रूप में भी उठाया जा सकता है. केंद्र और पंजाब - हरियाणा की सरकारों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अब कांग्रेस भले ही इस मामले पर सीमित राजनीति करे जिसकी सम्भावना कम ही है पर पंजाब और हरियाणा में पैर ज़माने की कोशिशों में लगी हुई आप इस मुद्दे को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ने वाली है . जनता से कम पर भावनात्मक रूप से अधिक जुड़ाव वाले इस मुद्दे को गम्भीरता के साथ देखने की आवश्यक है और आशा की जानी चाहिए कि केंद्र सरकार इस पर सही निर्णय लेगी.   
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