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Saturday, 27 February 2016

रेलवे और सुविधाओं का सच

                                          देश में मोदी सरकार के सत्ता सँभालने के बाद जिस तरह से रेलवे की सुविधाएँ बढ़ाने पर बहुत अधिक ध्यान दिए जाने की बातें की जा रही हैं उनको देखते हुए यदि वास्तविकताओं पर गौर किया जाये तो सरकार की तरफ से कई काम ऐसे भी किये जा रहे हैं जिनको किसी भी तरह से आम यात्रियों के हितों में नहीं माना जा सकता है. मनमोहन सरकार के समय रेलवे ने पहली बार मुंबई दिल्ली के बीच डायनामिक किराये पर आधारित प्रीमियम ट्रेनों के प्रायोगिक परिचालन की शुरुवात की थी और इस व्यस्त मार्ग पर यात्रियों की तरफ से रेलवे को इसका बहुत अच्छा रेस्पॉन्स भी मिला था पर इस लाभ को देखते हुए रेलवे ने सत्ता परिवर्तन के बाद २०१४ से जिस तरह से आम विशेष रेलगाड़ियों को प्रीमियम किराये के साथ चलाने की कोशिश की उसमें उसे जबरदस्त घाटे का सामना करना पड़ा तो इस तरह के डायनामिक किराये के स्थान पर उसने एक नए नाम से इसे सुविधा स्पेशल करके चलाना शुरू किया जिसमें अभी तक चलने वाली स्पेशल के मुकाबले अधिक किराया वसूला जाने लगा जिससे पहले से व्यस्त समय में यात्रियों को मिलने वाली इस सुविधा से रेलवे ने आसानी से पीछा छुड़ा लिया और यात्रियों से अधिक किराया वसूलने की तरफ अपने कदम बढ़ा दिए.
                                 मोदी सरकार आने के बाद यात्रियों के पास अन्य विकल्प न होने की दशा में रेलवे किस तरह से यात्रियों से अधिक किराया वसूली का काम कर रही है यह इस बात से समझा जा सकता है कि २०१३/१४ में केवल पश्चिम रेलवे में ही ६५ सामान्य स्पेशल गाड़ियों द्वारा ७०३९ फेरे लगाये गए थे वहीं २०१५/१६ में ऐसी गाड़ियों की संख्या केवल २१ और उनके फेरे २०४ ही रह गए. आखिर क्या कारण है कि दो वर्ष पहले आम जनता की सेवा करने के लिए जुटी हुई रेलवे की प्रत्येक गाड़ी १०० से अधिक फेरे लगा रही थी वह दो साल बीतने पर १० फेरे ही लगा पायी ? अगर यात्रियों के हितों में यह रेलवे की कुशलता है तो पहले वाली अकुशल रेलवे ही अच्छी थी क्योंकि उसमें इस तरह से यात्रियों को अधिक किराया देने के लिए मजबूर नहीं किया जाता था. प्रीमियम गाड़ियों का प्रयोग हर मार्ग पर सफल नहीं हुआ है इसलिए रेलवे की तरफ से सुविधा स्पेशल के नए नाम से यात्रियों से अधिक वसूली करने को प्राथमिकता दी जाने लगी है. क्या आम भारतीयों, गरीबों, मजदूरों के हितों की बात करने वाले पीएम मोदी की बात रेलवे की समझ में नहीं आती है क्योंकि रेलवे के इस तरह एक प्रयास किसी भी तरफ से आम यात्रियों के हितों की पूर्ति करने वाले नहीं कहे जा सकते हैं.
                              अगर आंकड़े देखे जाएँ तो अभी तक विशेष अवसरों पर चलने वाली इन स्पेशल गाड़ियों का सबसे अधिक उपयोग समाज के उस वर्ग द्वारा ही सर्वाधिक किया जाता है जो अपने घरों के आसपास रोजगार न होने के कारण देश के दूसरे प्रदेशों में काम करने के लिए जाता है और साल में एक दो बार ही त्योहारों के अवसरों पर उसे घर वापस आने का मौका मिलता है यदि इनके ६ लोगों के एक औसत परिवार की बात की जाये तो प्रति परिवार १८०० रूपये अधिक खर्च करके ही वो इस सुविधा स्पेशल ट्रेन का लाभ उठा सकता है. इस तरह से रेलवे एक परिवार के बजट को किस हद तक बिगाड़ने का काम कर रही है यह भी देखने का विषय है. इस बारे में खुद पीएम मोदी को ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि देश के अंदर इस प्रवासी वर्ग के पास सरकार को देने के लिए तो कुछ नहीं होता है पर चुनाव के समय किसी भी सरकार का खेल बिगाड़ने की क्षमता से यह भरपूर भी होता है. देश के पहले गुजराती पीएम मोरारजी की सरकार के रेलमंत्री मधु दंडवते ने ने ट्रेनों में तृतीय श्रेणी को ख़त्म किया था तो अब दूसरे गुजराती पीएम मोदी की सरकार के रेलमंत्री सुरेश प्रभु आम लोगों को उनकी हैसियत का एहसास फिर से दिलवाने के लिए श्रेणियों को फिर उसी आधार पर लागू करने की कोशिश में है.   
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