मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 8 February 2016

श्रम सुधार और चुनौतियाँ

                                                                 मोदी सरकार के सत्ता सँभालने के बाद से ही जिस तरह से यह माहौल बनाने की कोशिशें की जा रही थीं कि आने वाले समय में देश के श्रम कानूनों को पूरी तरह से उद्योगों के अनुकूल कर दिया जायेगा पर आज खुद आरएसएस के अनुषंगी संगठन भारतीय मजदूर संघ द्वारा जिस तरह से इसका विरोध किया जा रहा है उससे यह तो लगता है कि कहीं न कहीं मोदी सरकार मजदूरों के खिलाफ कुछ गलत कर उद्योगों को अनावश्यक छूट देने के बारे में मन बना चुकी है. इस तरह के सुधारों का विरोध पहले ही कांग्रेस और वामपंथी दलों की तरफ से किया जा चुका है जिसके बारे में सरकार ने स्पष्ट रूप से यही कहा था कि ये दल केवल विरोध की राजनीति कर रहे है जिससे आने वाले समय में देश का नुकसान होने वाला है. चिंता की बात यही है कि मोदी सरकार सुधारों के नाम पर जिस विदेशी मॉडल को अपनाना चाह रही है आज भी वह भारतीय परिस्थितियों के पूरी तरह से अनुकूल नहीं हो पाया है जिससे भी हर स्तर पर संदेह पनप रहा है. मोदी सरकार की इस बात से पूरी तरह से इंकार नहीं किया जा सकता है कि आज के श्रम कानूनों में सुधार की आवश्यकता है पर वह किस हद तक उद्योगपतियों के हक़ में और मजदूरों के विरोध में हो इस बात पर ही सारी बहस शुरू हो जाती है.
                                                         आज़ादी के बाद बनाये गए विभिन्न कानूनों के अंतर्गत मजदूरों के हितों का पोषण कुछ अधिक सिर्फ इसलिए ही किया गया था कि कहीं उद्योगपतियों द्वारा उनका शोषण न शुरू कर दिया जाये जिसके बाद ही मजदूरों के हितों की सही मायने में रक्षा की जा सकी थी. यह भी सही है कि कई बार इन कानूनों का मजदूर संगठनों द्वारा अनुचित लाभ भी उठाया गया है जिसके चलते कई उद्योगों को बीमार उद्योगों की श्रेणी में जाकर अपना काम बंद करने के लिए मजबूर भी होना पड़ा है. अब आवश्यकता इस बात की है कि नए कानूनों में दोनों पक्षों की बात की जाये जिसमें उद्योगपतियों के लिए जहाँ काम करने के भरपूर अवसर भी हों वहीं मजदूरों की तरफ से उन पर अनावश्यक दबाव की राजनीति भी न की जा सके. साथ ही मजदुरों के हितों की बात करते समय इस बात का भी ध्यान रखा जाये कि उद्योगपति भी उन पर पूरी तरह से हावी न हो जाएँ. देश में भ्रष्टाचार और हर बात में अनावश्यक राजनीति एक बड़ा मुद्दा है जो सदैव से ही मजदूरों और उद्योगपतियों के खिलाफ जाते रहते हैं फिर भी इनसे निपटने के लिए किसी भी सरकार की तरफ से ठोस उपाय कभी भी नहीं किये जाते हैं हर सरकार अपने करीबियों के हितों की रक्षा करने में ही लगे रहना चाहती है जिसका असर औद्योगिक वातावरण पर भी पड़ता ही है.
                                            नए कानूनों में अब दोनों पक्षों के बीच का रास्ता निकाल कर आगे बढ़ने के बारे में सोचा जाना चाहिए जिससे देश की प्रगति पर लगने वाले ग्रहण को रोका जा सके. मोदी सरकार को भी यह बात समझनी होगी कि आखिर वे क्या कारण हैं जिनके चलते आज उनका सहयोगी भारतीय मजदूर संंगठन भी क्यों उनके खिलाफ है ? नीतियों को बनाये जाने की परिस्थितियों पर गौर किया जाना आवश्यक है जिससे पूरे देश का औद्योगिक उत्पादन भी सुधारा जा सके. यदि मजदूरों और उद्योगपतियों के बीच लगातार इस तरह की खींचतान मची रहेगी तो देश की अंतर्राष्ट्रीय छवि को कैसे बचाया जायेगा जिसमें हम भारत को बेहतर काम करने की जगह के रूप में प्रस्तुत करने में लगे हुए हैं. यह केवल सरकार पर ही नहीं डाला जा सकता है क्योंकि सभी को मिलकर बीच का रास्ता निकालने की आवश्यकता भी है और यह संसद के साथ सामाजिक स्तर पर व्यापक विचार विमर्श के बाद ही तय किया जा सकता है. किसी एक पक्ष की तरफ झुकने से दूसरे के हितों की अनदेखी अपने आप ही हो जाती है इसलिए अब इस सब से बचते हुए मजबूत और कारगर श्रम सुधारों के बारे में संसद को सोचना चाहिए जिससे देश के महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों को सफलता पूर्वक संचालित किया जा सके.
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