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Tuesday, 9 February 2016

उप्र और तबादले

                                                        केंद्र सरकार और कोर्ट चाहे जितनी बार कुछ भी कहते और करते रहें पर उप्र में पिछले तीन दशकों से जिस तरह अधिकारियों का एक मुश्त तबादला किया जाता है वह किसी भी प्रकार से सुशासन को बढ़ावा नहीं दे सकता है. आज यूपी में यही कहा जाता है कि सत्ताधारी दल के नेताओं के बीच तबादला एक उद्योग की तरह पनप रहा है जिसमें जुगाड़ के साथ मनपसंद पोस्टिंग पाने वाले अधिकारियों के साथ कर्मठ अधिकारी बुरी तरह से पिस रहे हैं क्योंकि जब तक वे काम करने के लिए अपने विभाग जनपद या तहसील के बारे में पूरी जानकारी जुटा पाते हैं तब तक उनको नए स्थान के लिए तैनाती पकड़ा दी जाती है. एक समय था जब असामान्य परिस्थितियों को छोड़कर अधिकारी आराम से अपनी पोस्टिंग के तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया करते थे जिससे जहाँ उनका अपने अधीनस्थों के साथ बेहतर संपर्क और तालमेल हो जाता था वहीं वे किसी जनपद या क्षेत्र की बड़ी समस्या से निपटने के लिए शासन तक सही पैरवी करने में सक्षम भी हो सकते थे. अब यह सब कथित सुशासन के नाम पर पूरी तरह से गायब हो चुका है तथा कोई भी दल इस प्रथा को तोडना भी नहीं चाहता है.
                                                 आज यदि देखा जाये तो संभवतः अपनी पोस्टिंग के दो या तीन वर्ष तक एक स्थान पर टिके रहने वाले अधिकारियों को आसानी से उँगलियों पर ही गिना जा सकता है क्योंकि स्थानीय नेताओं का प्रशासन पर इतना अधिक दखल बढ़ गया है कि सत्ताधारी दल के जिलाध्यक्ष से लगाकर विधायकों तक से पटरी बैठाने में असफल रहने वाले किसी भी अधिकारी को पल भर में ही चलता कर दिया जाता है. आज सभी पार्टियों में स्थानीय बाहुबलियों के भरोसे ही सत्ता तक पहुँचने का काम किया जाता है तो इस परिस्थिति में किसी भी तरह से ये ही सरकार के आँख कान बन चुके हैं. इन स्थानीय नेताओं के कारण ही आज कई बार उप्र सरकार को नीचे भी देखना पड़ा है पर चुनावी राजनीति की मजबूरियां किसी भी सीएम को इन लोगों के खिलाफ कड़े कदम उठाकर सही राजनीति को स्थापित करने से रोकती ही रहती हैं. इस मामले में बसपा का शासन सपा से बेहतर कहा जा सकता है क्योंकि वहां पर मायावती के आगे किसी की भी नहीं चलती है जिससे बसपा में किसी भी कद के नेता के लिए अपने गृह जनपद में भी कुछ भी करने की मंशा सफल नहीं हो पाती है तथा तबादलों पर ही राजनैतिक हस्तक्षेप न्यूनतम ही बर्दाश्त किये जाने की नीति पर काम होता है.
                                               निश्चित तौर पर अपने विधान सभा चुनावी वर्ष में प्रवेश कर रहे उप्र के लिए यह सब बहुत ही समस्या उत्पन्न करने वाला है क्योंकि जिस तरह से राष्ट्रविरोधी तत्व प्रदेश में पैर ज़माने की कोशिश कर रहे हैं और इस परिस्थिति में भी पुलिस प्रशासन को ताश के पत्तों की तरह फेंटा जा रहा है तो जिलों से आने वाली महत्वपूर्ण सूचनाओं और उनके लखनऊ तक पहुँचाने की पूरी व्यवस्था पर भी संकट दिखाई देता है. नेताओं के दबाव से बाहर रहने वाले अधिकारी भी काम करने की मंशा नहीं दिखाते हैं क्योंकि उनको पता होता है कि इस बात का सरकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है जिसका सीधा असर प्रशासनिक क्षमता पर भी दिखाई देता है. आज यदि उप्र में पुलिस प्रशासन की धमक कम हो रही है तो उसके पीछे भी सरकार की यही मंशा कहीं न कहीं से ज़िम्मेदार है क्योंकि अधिकारियों के पास भी इस बात का बहाना होता है कि वे सीमित समय में आखिर किस तरह से पूरी व्यवस्था को सुधार सकते हैं ? सरकार को यदि अपनी कल्याणकारी योजनों को सही लोगों तक पहुँचाना और कानून व्यवस्था को सही रखना है तो अब उसे इस मानसिकता से बाहर निकलने की आवश्यकता भी है क्योंकि जनता के हाथ में किसी भी सरकार को हटाने का मौका हर पांच साल में आता ही रहता है पर जनता का उससे कोई भला नहीं हो पाता है.         
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