मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 29 April 2016

मेधावी छात्र छात्राओं पर दबाव

                                                                                      देश के कोचिंग हब के रूप में विकसित हो चुके कोटा में इस वर्ष १७ वर्षीय तृप्ति त्रिपाठी द्वारा आत्महत्या कर लिए जाने के बाद पांच बच्चों द्वारा इस तरह का कदम उठाकर अपनी जान दी जा चुकी है जिससे देश को यह सोचने के लिए मजबूर होना ही पड़ेगा कि प्रतिस्पर्धा की इस दौड़ में क्या अभिभावक अपने बच्चों के लिए ऐसी स्थिति पैदा कर रहे हैं जिनके चलते बच्चे आत्महत्या तक का अतिवादी कदम उठाने से नहीं चूक रहे हैं ? तृप्ति के मामले में यह और भी अजीब इसलिए है क्योंकि उसने सामान्य श्रेणी में ११० अंकों की सीमा को पार करते हुए १४४ अंक पाकर मेंस के लिए अपनी जगह सुरक्षित कर ली थी फिर आखिर ऐसा क्या था कि इतनी मेधावी छात्रा को ऐसा करने पर मजबूर होना पड़ा और आज उसके माता पिता के सपने टूटने के साथ ही उनके लिए यह एक ऐसा हादसा हो गया है जिसे वे जीवन में कभी भी भूल नहीं पायेंगें. तृप्ति ने जिस तरह से अपने को इंजीनियर के रूप में स्वीकार करने से इंकार किया है उससे यही लगता है कि उसके अभिभावकों की तरफ से उस पर इस क्षेत्र में जाने का बहुत अधिक दबाव था और उसने उनका सम्मान करते हुए बेमन से यह परीक्षा देकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन भी किया था पर इस सबके बीच हमारे बीच से एक मेधावी छात्रा का इस तरह से जाना क्या हमें नए सिरे से सोचने को मजबूर नहीं करता है ?
                               भारत जैसे देश में जहाँ तेज़ी से बढ़ते हुए मध्यम वर्ग के परिवारों में अपने बच्चों को आगे बढ़ाने के सपने पलते रहते हैं उन्हें किसी भी तरह से गलत तो नहीं कहा जा सकता है क्योंकि बच्चों के लिए उनके अभिभावकों से अच्छा कोई भी नहीं सोच सकता है और बच्चों की कई बार इतनी समझ भी नहीं होती है कि वे अपने दम पर ही यह तय कर सकें कि उनके लिए क्या अच्छा और क्या बुरा हो सकता है. इस परिस्थिति में ही अभिभावकों का रोल महत्वपूर्ण हो जाता है जिससे निपटने के लिए वे अपने अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए अपने बच्चों को उसी क्षेत्र में भेजने की जिद पकड़ लेते हैं जिसे वे अपने अनुसार सर्वश्रेष्ठ मानते हैं जिसके चलते कई बार गलत क्षेत्र में गलत लोग काम करते हुए मिलते हैं और पूरी रूचि न होने के कारण उनका प्रदर्शन उनकी क्षमताओं के अनुरूप कभी भी नहीं हो पाता है जिससे वे केवल आपने अभिभावकों के सपनों को पूरा करने का माध्यम ही बनकर रह जाते हैं. इस समस्या से निपटने के लिए अब बच्चों पर इस तरह के अनावश्यक दबाव डालने से बचने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब तक बच्चे दबाव मुक्त होकर आगे नहीं बढ़ेंगें तब तक उनका सर्वोत्तम प्रदर्शन सबके सामने नहीं आ पाएगा.
                               इस व्यवस्था को पूरी तरह से सुधारने के लिए सरकार को भी नए सिरे से शिक्षा नीति को निर्धारित करने का काम करना ही होगा तथा मेधावियों के लिए गुणवत्तापरक शिक्षा की व्यवस्था पर भी ध्यान देना होगा. शिक्षा के व्यवसायीकरण के चलते आज देश भर में बच्चों के सपने टूटने का क्रम लगातार ही देखा जा सकता है क्योंकि पारिवारिक दबाव में बच्चे उस शिक्षा की तरफ धकेल दिए जाते हैं जहाँ उनका कोई भविष्य ही नहीं होता है. माध्यमिक स्तर पर ही बच्चों को उनकी रूचि के अनुरूप विषय चुनने और उनमें ही आगे पढ़ाई करने का विकल्प पूरी तरह से खुला होना चाहिए और इसके लिए उनका मूल्यांकन करने की विद्यालयों के स्तर पर ही व्यवस्था भी होनी चाहिए क्योंकि जब तक बच्चे अपने मनपसंद विषयों को रूचि लेकर नहीं पढ़ेंगें तब तक उनके अंदर की प्रतिभा को पूरी तरह से सामने नहीं लाया जा सकेगा. अब इस मसले पर गम्भीर चिंतन किया जाना चाहिए और सरकार, विद्यालयों, अभिभावकों और कॅरियर सम्बन्धी जानकारी देने वाले विशेषज्ञों को इस बारे में विचार करना चाहिए जिससे छात्रों को इस तरह के अतिवादी क़दमों को उठाने से पूरी तरह से रोका जा सके और देश के लिए हर क्षेत्र में बहुत अच्छा काम करने में सक्षम प्रतिभा को सामने लाया जा सके.     
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