मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 6 December 2016

प्रीमियम ट्रेन और समस्या

                                                                     सीमित रूप से आर्थिक रूप से सक्षम यात्रियों को राजधानी जैसी सुविधाओं से युक्त ट्रेन के संचालन के साथ बेहतर सेवाएं देने के उद्देश्य के साथ २०१३ में शुरू की गयी भारतीय रेलवे की प्रीमियम ट्रेन सेवा शुरुवाती परीक्षणों में बहुत सफल रही थी जिसके बाद केंद्र में सरकार बदलने के बाद उन नीतियों पर संभवतः पुनर्विचार किया गया कि रेलवे की आमदनी को बढ़ाने में इन प्रीमियम ट्रेनों का उपयोग किस तरह से किया जा सकता है. इस मामले में संभवतः रेल मंत्री के सामने केवल लाभ के आंकड़े ही प्रस्तुत किये गए जिससे उन्हें यह बात समझ में आयी कि विभिन्न मार्गों पर चलने वाली अन्य महत्वपूर्ण ट्रेनों में भी इस तरह की व्यवस्था को लागू करने से रेलवे की आमदनी को बिना अतिरिक्त संसाधनों के ही बढ़ाया जा सकता है. यह योजना सफल नहीं हो सकती है इस बात पर पहले से ही आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं पर सितंबर में सर्ज प्राइसिंग लागू होने के बाद जिस तरह से उच्च श्रेणियों में रेलवे को त्यौहारी सीजन के बावजूद आमदनी में मामूली बढ़त के साथ बड़ी संख्या में यात्रियों को खोना पड़ा है उसके बहुत ही दूरगामी परिणाम आ सकते हैं और छोटी दूरी तक यात्रा करने वाले यात्री हमेशा के लिए रेलवे से दूर भी जा सकते हैं.
                                            इसे इस तरह से समझ जा सकता है कि यदि एक परिवार के पांच लोग किसी अवसर पर ५०० से ७०० किमी की यात्रा रेल से करना चाहते हैं तो सामान्य किराये में वे रेलवे को ही प्राथमिकता दिया करते थे पर सर्ज प्राइसिंग लागू होने के बाद उनका यह किराया निजी टैक्सी लेकर जाने से भी मंहगा पड़ जाता है जिसमें स्टेशन तक आने जाने और सामान उठाने आदि के खर्चे भी लगते हैं पर अपनी बुक की हुई टैक्सी से जहाँ यात्रा आसानी घर से घर तक की जा सकती है वहीं अपने सामान के बारे में भी अधिक चिंता नहीं करनी पड़ती है. इस तरह से एक बार यात्रियों का यह समूह यदि रेलवे से अलग होकर इस तरह की यात्राओं का आदी जो जाता है तो रेलवे के लिए उन्हें दोबारा अपने से जोड़ पाना भी आसान नहीं होने वाला है क्योंकि रेलवे की तरफ से जब तक इन किरायों को दोबारा तर्क संगत करने के बारे में सोचा जायेगा तब तक राजमार्गों पर दबाव बढ़ ही जाने वाला है. इससे जहाँ एक तरफ रेलवे को नुकसान होना है वहीं देश के पर्यवरण को भी बहुत नुकसान होने वाला है क्योंकि हज़ारों यात्रियों को एक साथ सफर पर ले जाने वाली रेल के यात्री भी सड़क मार्गों पर भीड़ बढ़ाते हुए नज़र आने वाले हैं जिससे पहले से ही दबाव को झेल रहे मार्गो की हालत और भी ख़राब ही होने वाली है.
                                        अच्छा हो कि रेलवे अपनी इस नीति पर पुनर्विचार करे और आने वाले समय में हर ट्रेन में सर्ज प्राइसिंग लागू करने के स्थान पर केवल विशेष श्रेणियों की नयी ट्रेनों का सञ्चालन करे और आम यात्रियों से अनावश्यक रूप से खास किराया वसूलने और अपने घाटे को कम करने के तरीके से बच सके. यदि रेलवे यात्रियों को बहुत अच्छी सुविधाएँ देने में सफल होता है तो वह यात्रियों से तर्क संगत रूप में किराया लेने का हक़दार भी है पर जिस तरह से केवल आंकड़ों के हेरफेर से आमदनी को बढाए जाने की कोशिशें की जा रही है वे लंबे समय में रेलवे के आर्थिक हितों पर भी चोट करने वाली ही साबित होने वाली है. रेलवे इस बात के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है कि वह अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहे पर उसे यह भी ध्यान में रखना होगा कि रेलवे पूरे देश की रगों में दौड़ते हुए खून की तरह है जिससे सभी को जीवन मिलता है कहीं ऐसा न हो कि आमदनी बढ़ाने के चक्कर में रेलवे आम लोगों से बहुत दूर चली जाये और आने वाले समय में इसे फिर से पटरी पर लौटाना कठिन साबित हो जाये. आज जब खुद पीएम देश में बुलेट ट्रेन चलाये जाने के लिए बहुत गंभीर हैं तो रेलवे के बाकी हिस्से को अपने दम पर प्रचालन के योग्य बनाये रखना भी अपने आप में बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी ही साबित होने वाली है.       
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Wednesday, 30 November 2016

काला धन सरकार और कानून

                                                     ८ नवम्बर के विमुद्रीकरण घोषणा के बाद से जिस तरह से सरकार और रिज़र्व बैंक के सामने एक बिल्कुल नयी तरह की समस्या आ रही है उससे संभवतः कम तैयारियों के साथ शुरू किये गए विमुद्रीकरण के बहुत कमज़ोर परिणामों के साथ केंद्र सरकार और भी अधिक निशाने पर आ जाये क्योंकि इतने बड़े कदम से जहाँ सरकार को ४ से ५ लाख करोड़ रूपये बचा लेने की संभावनाएं दिखाई दे रही थीं अब यह आंकड़ा गड़बड़ाने की तरफ जाना शुरू हो चुका है तथा विमुद्रीकरण को काले धन को अर्थव्यवस्था से कम करने या पूरी तरह से हटाने के लिए एक विकल्प के रूप में अपनाये जाने की मंशा पर भी सवाल उठने लगे हैं. देश और विदेशों के अर्थशास्त्री विमुद्रीकरण को कभी भी काले धन पर अंकुश लगाने में महत्वपूर्ण कदम नहीं मानते हैं और जिस तरह से सरकार को आंकड़ों के दम पर कुछ लोग यह समझाने में सफल हुए कि इससे देश का काल धन समाप्त हो जायेगा वह भी यथार्थ पर कम और भ्रामक अधिक लगता है. इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक बात यह है कि अपने विशुद्ध राजनैतिक लाभ हानि के साथ आर्थिक हितों को ध्यान में रखने वाले पीएम मोदी से आखिर इस तरह की बड़ी चूक कैसे हो गयी क्योंकि कहीं न कहीं उनसे निश्चित तौर पर सही आंकड़ों को या तो छिपाया गया या फिर तथ्यपरक बातें उनके सामने रखी ही नहीं गयीं.
                                    सरकार के पास इस योजना के लिए कोई बड़ा वैकल्पिक प्लान भी नहीं था क्योंकि जब तक सरकार जान पाती तब तक काले धन को सोने, प्रॉपर्टी और हवाला के माध्यम से काफी हद तक ठिकाने लगा दिया गया था और अब मजबूरी में अपने को सही साबित करने के लिए सरकार की तरफ से ५०-५० योजना को लाया गया है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि जिन लोगों ने बिना पूछताछ वाली ३०सितम्बर तक की आय घोषित करने की योजना में अपने राज नहीं खोले तो वे अब क्यों सामने आयेंगें ? पहले उन पर किसी भी तरह की कार्यवाही से सरकार ने खुद ही बचाने की बात की थी पर अब उन पर कुछ कानून लागू होंगें और यदि उनमें कोई गड़बड़ी पायी गयी तो आने वाले समय में उन्हें विभिन्न विभागों की जांचों का सामना भी करना पड़ सकता है. एक तरफ जहाँ काले धन वालों को कोई मुश्किल नहीं हुई वहीं आमलोगों को इससे बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा जो कि पूरा देश देख रहा है क्योंकि सरकार और खुद पीएम मोदी जनता से यह अपील कर रहे हैं कि देश के बेहतर भविष्य के लिए उन्हें कुछ कष्ट उठाने के लिए तैयार रहना पड़ेगा.
                                    देश के आर्थिक परिदृश्य पर जिस तरह का नकारात्मक प्रभाव पड़ना शुरू हो चुका है उसके चलते ही जीडीपी से जुड़े हुए अनुमानों को कम किया जाने लगा है जिससे आने वाले समय में देश की आर्थिक गतिविधियों को तेज़ करने में जुटी हुई सरकार को बहुत बड़ा धक्का भी लगने वाला है क्योंकि चुनावों के समय किये गए प्रति वर्ष दो करोड़ रोजगार सृजन के स्थान पर बिना सम्पूर्ण तैयारी के किये गए इस विमुद्रीकरण से लगभग सभी क्षेत्रों में पहले से उपलब्ध रोज़गार के अवसरों पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ा है. अब भी समय है कि सरकार और विपक्ष को संसद में बैठकर बिना एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप के देश के आर्थिक परिदृश्य को सही करने के बारे में सोचना चाहिए. सरकार को यह नहीं मानना चाहिए कि वह जो चाहे कर सकती है और विपक्ष को भी सरकार की हर मंशा को संदेह की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए. सदन सुचारू रूप से चले यह सत्ता पक्ष की अधिक ज़िम्मेदारी होती है क्योंकि उसे ही विपक्ष को साथ में लेकर चलना भी होता है. किसी मुद्दे पर बड़े विवाद होने की सम्भावना को देखते हुए उस पर संसदीय समितियों में गहन चर्चा भी होनी चाहिए जिससे सदन में आवश्यक विधायी काम काज किया जा सके. आज सरकार भी सदन को कम से कम दिन ही चलाना चाहती है जिससे विपक्ष अपनी बात रखने के स्थान पर अपनी उपेक्षा को कार्यवाही बाधित कर दिखाने को मजबूर होता है अब इस पूरी स्थिति को बदलने की आवश्यकता भी है जिससे देश की गति को बनाये रखा जा सके.        
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