मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 28 September 2016

भारत-पाक-सार्क और आतंक

                                             जिस भावना के साथ एक समय दक्षिण एशिया के देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और खेल के स्तर पर सहयोग करने के लिए सार्क देशों के समूह की स्थापना की गयी थी लगता है अब वह पाकिस्तान के आतंक समर्थक रवैये के चलते समाप्त होने की कगार पर है. अस्सी के दशक से पाक और भारत के बीच सीमा पर आतंक को लेकर चल रही शंकाओं और आरोप प्रत्यारोप के बीच ही सार्क नेताओं ने इस समूह का गठन भी किया गया था पर हर मामले में भारत से लाभ उठाने वाले पाकिस्तान ने समय आने पर कभी भी कोई ऐसा सहयोगात्मक रवैया नहीं अपनाया जिससे यह समझा जा सकता कि वह भी इस संगठन को मज़बूती से आगे बढाकर पूरे क्षेत्र की तरक्की के लिए काम करना चाहता है. पहले पंजाब और फिर कश्मीर में आतंकी संगठनों को हर तरह का सहयोग के साथ ही उसने देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपने यहाँ प्रशिक्षित आतंकियों के लिए जिस तरह से हर स्तर पर सुरक्षा उपलब्ध कराई उससे वह पूरी वैश्विक बिरादरी के सामने बेनकाब तो हो गया पर पाकिस्तान जैसा हाँ में हाँ मिलाने वाला कोई दूसरा क्षेत्रीय देश न होने के कारण अमेरिका और अन्य देश भी उस पर मजबूरी में भरोसा करते हुए दिखाई देते हैं. अमेरिका ने अपने सबसे बड़े शत्रु ओसामा को भी पाकिस्तान में घुसकर मार पर अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते आज वह फिर से पाकिस्तान पर भरोसा करने के लिए मजबूर ही दिखाई देता है जबकि उसकी छोटी सी कोशिश भी पाक के जेहादी समूहों से निपटने में बहुत कारगर साबित हो सकती है.
                                   भारत ने जिस तरह से आगामी सार्क शिखर सम्मलेन से किनारा किया है उसके बाद अब पाकिस्तान के लिए इस समस्या से निपट पाना बहुत मुश्किल ही साबित होने वाला है क्योंकि हर तरह एक तनाव के बीच भी भारत ने इस सहयोग पर अपने पाकिस्तान के साथ चल रहे बेहद ख़राब द्विपक्षीय संबंधों के चलते कोई आंच नहीं आने दी. सार्क चार्टर के अनुसार यदि एक भी देश का प्रमुख इसमें आने से मना करता है तो यह बैठक हो ही नहीं सकती है इसलिए अब पाकिस्तान पर इस शिखर बैठक को कराने का दबाव भी आ गया है. आज जिस तरह से पाक का रवैया है और भारत की तरफ से युद्ध से पहले के हर उस विकल्प पर गौर किया जा रहा है वह मोदी सरकार की सही नीति को ही दिखाता है क्योंकि किसी भी मामले में युद्ध केवल अंतिम विकल्प ही होना चाहिए उसे सबसे पहले शुरू करने से हर पक्ष का नुकसान ही होता है. बिना युद्ध किये भी भारत के पास बहुत सारे ऐसे विकल्प खुले पड़े हैं जिसके चलते वह पाकिस्तान के लिए कुछ वर्षों के लिए बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर सकता है जिससे उबरने में पाकिस्तान की कोई भी देश मदद नहीं कर पायेगा. सिंधु नदी के समझौते को रद्द करने से पहले भारत के पास यह विकल्प भी उपलब्ध है कि वह अपने हिस्से में मिले २०% पानी का पूरा उपयोग करना शुरू कर दे और पाकिस्तान के लिए कृषि क्षेत्र में एक बड़ा संकट उत्पन्न कर दे. भारत जम्मू कश्मीर में पहले से ही सिंधु और अन्य नदियों पर अपने २०% हिस्से के उपयोग के सम्बन्ध में पन-बिजली परियोजनाओं को बनाना शुरू कर चुका है और आने वाले समय में बगलिहार जैसी अन्य परियोजनाएं भी सामने आ सकती हैं जिससे कश्मीरियों के लिए तो आसानी होगी पर पाकिस्तान के लिए हर स्तर पर परेशानियों का दौर शुरू हो जायेगा. घाटी के लोग सिंधु समझौते को अपने खिलाफ भी मानते रहे हैं तो इसे रद्द किये जाने की किसी भी घोषणा या संसाधनों के भरपूर दोहन से जुड़े मसलों में भी घाटी का पूरा सहयोग भी साथ ही रहने वाला है.
                                   भारत की तरफ से १९९६ में हुए डब्लूटीओ समझौते के चलते ही पाकिस्तान को अपनी तरफ से मोस्ट फेवरेट नेशन का दर्ज़ा दिया गया है पर अभी तक पाकिस्तान ने ऐसा कदम नहीं उठाया है जबकि सार्क में भी इस तरह के द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने के लिए व्यापक चर्चाएं होती रहती है. यदि सिंधु नदी के समझौते को तोड़ने से पहले भारत केवल अपने हिस्से के पानी का इस्तेमाल करने के साथ ही पाकिस्तान के साथ सहयोगी व्यापार के स्थान पर इसे रोकने के बारे में विचार करे जिससे पाक को भी अन्य सभी तरह के टैक्स भी देने पढ़ें तो वहां सबसे अधिक कपड़ा कारोबार ही प्रभवित होने वाला है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के साथ कपडा उद्योग में पाक और बांग्लादेश ही कड़ी प्रतिस्पर्धा में रहा करते हैं. यदि भारत की तरफ से पाक को डब्लूटीओ के तहत मिली सुविधाएँ वापस ले ली गयीं तो उसके कपडा उद्योग के लिए सस्ते कच्चे माल का विकल्प समाप्त हो जायेगा तथा पाक सरकार पर भी उद्योग जगत का दबाव बन सकता है. आम घरों में रोज़ ही उपयोग में आने वाली बहुत सारी वस्तुएं भी पाकिस्तान को एमएफएन के चलते ही सही मूल्य पर भारत से आसानी से मिल जाती हैं जिससे वहां मंहगाई पर भी नियंत्रण रहा करता है पर आने वाले समय में इन सभी वस्तुओं के मंहगे होने के बाद आम जनता के लिए भी समस्याएं बढ़ सकती है जिससे पाकिस्तान सरकार और सेना पर भी दबाव बन सकता है. भारत सरकार की तरफ से अब इस दिशा में आगे बढ़ने का सही समय आ गया है क्योंकि पूरे देश में पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा तो है और उसे सबक सिखाने की एक चाह भी बढ़ती जा रही है ऐसी स्थिति में युद्ध से पहले ही पाकिस्तान को आर्थिक स्तर पर कमज़ोर करके और वहां की जनता में सरकार के क़दमों के प्रति गुस्सा उत्पन्न कर ही उसे रणनीतिक मात दी जा सकती है.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 25 September 2016

दवा मूल्य नियंत्रण और यथार्थ

                                                     देश में आवश्यक दवाओं के मूल्यों को उचित दरों पर बेचे जाने के लिए समय समय पर जारी किये जाने वाले ड्रग प्राइस कण्ट्रोल ऑर्डर्स (डीपीसीओ) के माध्यम से निश्चित तौर पर रोगियों को सस्ती दवाओं का विकल्प मिलना शुरू हो गया है पर जिस तरह से एक बार सूचीबद्ध किये जाने के बाद सरकार और मूल्य नियंत्रण प्रणाली को देखने वालों की तरफ से दोबारा इस बात पर कोई विमर्श ही नहीं किया जाता है कि निर्धारित की गयी दवाएं बाजार में अब किस मूल्य पर उपलब्ध हो रही है तो उससे आमलोगों तक पहुँचने वाले लाभ को कैसे आँका जा सकता है ? एक नए चलन के रूप में दवा कंपनियों की तरफ से अब डीपीसीओ में आने वाली दवाओं के उत्पादन या उनके साथ किसी अन्य दवा को डालकर उसका मूल्य भी बढ़ाने के रास्ते खोल दिए गए हैं तो आम रोगियों को उससे क्या लाभ मिलने वाले हैं ? डीपीसीओ नीति में आज जो बड़ी कमी दिखाई दे रही है उस पर किसी का ध्यान भी नहीं जा रहा है जिससे सरकार की तरफ से घोषित की गयी सूची की अधिकांश दवाइयां रोगियों को उतनी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं जितनी पहले हो जाया करती थीं तो क्या नीति में हमें फिर से बदलाव करने की आवश्यकता नहीं है जो आम लोगों तक उचित मूल्य पर दवाओं की उपलब्धता को सुनिश्चित कर सके ?
                                             उदाहरण के तौर पर डॉक्सीसाइक्लिन नाम की एंटीबॉयोटिक जो आज भी बहुत कारगर है डीपीसीओ में आने से पहले ६/७ रूपये की मिलती थी पर इसका मूल्य निर्धारण करते समय इस बात पर कोई विचार ही नहीं किया गया कि क्या दवा कंपनियां इसे १ रु का बनाकर बेचने में दिलचस्पी दिखाएंगीं ? आज जिन कंपनियों द्वारा इस दवा को बनाया जा रहा है तो उनमें से कोई इसके साथ बेहद सस्ती लैक्टोबैसिलस या बीटा साइक्लोडेक्सट्रिन को मिलाकर आसानी से ५/६ रूपये में बेच रहे हैं तथा अधिकांश कंपनियों द्वारा इसे बनाये जाने से ही छुटकारा पा लिया गया जिससे एक महत्वपूर्ण एंटीबॉयोटिक जिसका आज तक दुरूपयोग नहीं हुआ है और जिसके खिलाफ रेसिस्टेन्स के मामले भी कम ही मिलते हैं उसे क्यों रोगियों से दूर किया जा रहा है ? क्या मूल्य निर्धारण की सूची को लंबा करने के लिए ही इस तरह की बातों को किया जाता है क्योंकि इसके वर्तमान स्वरुप से रोगियों को पहले ही मिलने वाली आवश्यक दवाएं यदि मिलनी ही बंद हो जाएँ तो उससे किसका भला होने वाला है ? जो कंपनियां इस तरह के किसी भी अन्य मिश्रण के साथ इस तरह की दवाओं को बेचने का काम कर रही हैं क्या उनके खिलाफ सरकार के पास कोई ठोस नीति है ?
                                         सरकार को इस समस्या से निपटने के लिए एक बार फिर से अपनी सार्वजनिक क्षेत्र की दवा इकाइयों को पुनर्जीवित करना ही होगा क्योंकि यदि दवा का कारोबार पूरी तरह से इन व्यवसायी कंपनियों के हाथों में चला गया तो आने वाले समय में सरकार के पास डीपीसीओ की एक लंबी लिस्ट ही होगी और ये सस्ती दवाएं बाज़ार में कहीं भी दिखाई ही नहीं देंगीं. सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों को जीवित करने से दोहरा लाभ भी होने वाला है जिससे एक तरफ नियंत्रित मूल्य वाली दवाएं रोगियों को उपलब्ध होती रहेंगीं वहीं दूसरी तरफ इन इकाइयों के द्वारा बड़ी संख्या में रोज़गार का सृजन भी किया जाता रहेगा. निजी क्षेत्र की कंपनियों के सामने तब इस बड़े बाज़ार पर कब्ज़ा करने के लिए नए सिरे से सोचने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा भी नहीं बचेगा. एक समय था जब आइडीपीएल, हिदुस्तान एंटीबायोटिक्स और विभिन्न राज्य सरकारों की दवा कंपनियां सारे देश की ७०% मांग को पूरा कर दिया करती थीं पर बाद में इनमें समय के साथ बदलाव और आधुनिकीकरण को न अपनाये जाने के कारण तथा सरकार की तरफ से इसे बीमार उद्योग मान लेने के चलते कई तरह की समस्याएं भी सामने आयीं. आज एक नयी सरकारी दवा उत्पादन नीति के अन्तर्गत इन सभी केंद्र और राज्य की दवा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया जाना चाहिए और एक बड़ी कंपनी बनायीं जानी चाहिए जिससे वो पूरे देश के सरकारी अस्पतालों को दवाओं की आपूर्ति कर सके और आम लोगों को उचित मूल्य पर औषधियां उपलब्ध कराने के साथ रोजगार का सृजन भी कर सके.         
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