मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 27 अगस्त 2011

बीएसएनएल है तो भरोसा है ?

देश में पहली बार सार्वजनिक क्षेत्र की दूरसंचार कम्पनी भारत संचार निगम लिमिटेड ने जुलाई ११ माह में सर्वाधिक नए ग्राहक जोड़ कर निजी कम्पनियों के लिए एक तरह से खतरे की घंटी बजा ही दी है. सभी जानते हैं कि किस  तरह से देश में सार्वजनिक उपक्रमों को चलाया जाता है फिर भी आम लोगों से जुड़ी और प्रतिस्पर्धा के इस युग में इस तरह किसी कम्पनी का अपने आप ही यहाँ तक पहुंचना यह दर्शाता है कि आज भी देश का आम आदमी सार्वजनिक कम्पनियों पर पूरा भरोसा करता है बस समस्या केवल इतनी रहती है कि इन जगहों पर आम उपभोक्ता की सुनवाई बहुत देर से होती है जिससे लोग अन्य जगहों पर जाना पसंद करते हैं. आज भी नेटवर्क और मूल्य के हिसाब से संचार निगम की सेवाएं आम लोगों की पहुँच तक बनी हुई है फिर भी निगम द्वारा लोगों को अच्छी सेवाएं दिए जाने के बारे में ठोस उपाय नहीं किये जाते हैं ? अब इस लाभ को किस तरह से निगम अपने लिए एक हथ्यार की तरह इस्तेमाल कर पाता है यह तो समय ही बताएगा पर थोड़े से प्रयास से इसे फिर से पुरानी जगह दिलाई जा सकती है अब यह स्पष्ट हो गया है.
         पिछले माह जिस तरह से लाभ वाले क्षेत्रों में निजी कम्पनियों ने अपने शुल्कों में चुपके से बढ़ोत्तरी की उसके बाद भी हो सकता है कि लोगों का रुझान निगम की तरफ़ बढ़ा हो क्योंकि इस उपलब्धि को पाने के लिए निगम ने कोई विशेष प्रयास किया हो ऐसा तो नहीं लगता है ? आज भी पूरे देश में अपनी पहुँच और सेवा के कारण निगम के पास आगे होने का बहुत बड़ा कारण है पर जब इस पूरे नेटवर्क का लाभ ही नहीं उठाया जा सकता है तो इस निगम में बैठे हुए लोग आख़िर क्या कर रहे हैं ? आज भी लोग कुछ सेवाओं के लिए केवल निगम के पास ही जाते हैं क्योंकि उनके पास पूरे देश में कुछ जगहों को छोड़कर अन्य कोई विकल्प ही नहीं है पर निगम अपनी विशालता और उनकी इस मजबूरी का लाभ उनको परेशान करने में ही खो देता है जबकि इस तरह से निगम पूरे देश में अपनी सभी सेवाओं को तेज़ी से आगे ला सकता है. निगम में आज भी वही राग चल रहा है कि जब किसी क्षेत्र में कोई निजी कम्पनी कोई सेवा देना शुरू कर देती है तो यहाँ पर उसे सुविधा के लिए आवश्यक तकनीकी प्रबंध शुरू किये जाते हैं जिससे अच्छे और विस्तृत नेटवर्क होने के बाद भी उसका लाभ निगम को नहीं मिल पाता है.
    आज भी सेवाओं के मामले में निगम पिछड़ा ही रहता है क्योंकि उसे हर मामले में मुख्यालय की तरफ़ देखना होता है जबकि कुछ फ़ैसले केवल स्थानीय आधार पर ही लिए जाने की ज़रुरत होती है ? आज भी निगम अपने कर्मचारियों की जवाबदेही तय नहीं कर पाया है और सबसे बड़ी बात जो है वह यह कि जनपद स्तर से लगाकर आगे तक की व्यवस्था को सँभालने वाले आईटीएस अधिकारी वेतन तो निगम से लेते हैं पर कर्मचारी वे भारत सरकार के हैं जिससे विभाग में उनकी ज़िम्मेदारी कम हो जाया करती है अगर उनके सामने यह रास्ता न हो और उन्हें केवल यह पता हो कि उनकी नौकरी और वेतन भत्ते भी निगम ही देखेगा तो शायद वे निगम के बारे में कुछ और अच्छे से सोच सकें ?  जब इन अधिकारियों की सेहत पर निगम की सेहत का असर होने लगेगा तो ये ख़ुद ही निगम की दशा को सुधारने का काम करने लगेंगें. ग़ैर-ज़िम्मेदारी का आलम यह है कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में पिछले ४ दिनों से निगम के नेटवर्क में कुछ समस्या है पर इतना समय होने के बाद भी न तो निगम ने उपभोक्ताओं को किसी माध्यम से सूचित किया है और न ही इसे ठीक करवाने के बारे में कोई प्रयास किये हैं जिनसे नेटवर्क सुधर जाता ? अपनी इन्हीं हरकतों के कारण आज तक यह भारत में दूरसंचार कम्पनियों में सिरमौर नहीं बन पाया है.

 
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